chevron_left सभा पर्व अध्याय ६५
युधिष्ठिर उवाच:
राजन्किं करवामस्ते प्रशाध्यस्मांस्त्वमीश्वरः |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
नित्यं हि स्थातुमिच्छामस्तव भारत शासने ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अजातशत्रो भद्रं ते अरिष्टं स्वस्ति गच्छत |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अनुज्ञाताः सहधनाः स्वराज्यमनुशासत ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
इदं त्वेवाववोद्धव्यं वृद्धस्य मम शासनम् |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
धिय़ा निगदितं कृत्स्नं पथ्यं निःश्रेय़सं परम् ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वेत्थ त्वं तात धर्माणां गतिं सूक्ष्मां युधिष्ठिर |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विनीतोऽसि महाप्राज्ञ वृद्धानां पर्युपासिता ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यतो वुद्धिस्ततः शान्तिः प्रशमं गच्छ भारत |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
नादारौ क्रमते शस्त्रं दारौ शस्त्रं निपात्यते ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न वैराण्यभिजानन्ति गुणान्पश्यन्ति नागुणान् |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विरोधं नाधिगच्छन्ति ये त उत्तमपूरुषाः ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
संवादे परुषाण्याहुर्युधिष्ठिर नराधमाः |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रत्याहुर्मध्यमास्त्वेतानुक्ताः परुषमुत्तरम् ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नैवोक्ता नैव चानुक्ता अहिताः परुषा गिरः |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रतिजल्पन्ति वै धीराः सदा उत्तमपूरुषाः ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सन्तः प्रतिविजानन्तो लव्ध्वा प्रत्ययमात्मनः ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तथाचरितमार्येण त्वय़ास्मिन्सत्समागमे |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधनस्य पारुष्यं तत्तात हृदि मा कृथाः ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मातरं चैव गान्धारीं मां च त्वद्गुणकाङ्क्षिणम् |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उपस्थितं वृद्धमन्धं पितरं पश्य भारत ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रेक्षापूर्वं मय़ा द्यूतमिदमासीदुपेक्षितम् |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मित्राणि द्रष्टुकामेन पुत्राणां च वलावलम् ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अशोच्याः कुरवो राजन्येषां त्वमनुशासिता |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मन्त्री च विदुरो धीमान्सर्वशास्त्रविशारदः ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
त्वय़ि धर्मोऽर्जुने वीर्यं भीमसेने पराक्रमः |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
श्रद्धा च गुरुशुश्रूषा यमय़ोः पुरुषाग्र्ययोः ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अजातशत्रो भद्रं ते खाण्डवप्रस्थमाविश |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भ्रातृभिस्तेऽस्तु सौभ्रात्रं धर्मे ते धीय़तां मनः ||
१५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
इत्युक्तो भरतश्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
१६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
कृत्वार्यसमय़ं सर्वं प्रतस्थे भ्रातृभिः सह ||
१६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ते रथान्मेघसङ्काशानास्थाय़ सह कृष्णय़ा |
१७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रय़युर्हृष्टमनस इन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ||
१७ ख