chevron_left द्रोण पर्व अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच:
किं कुर्वाणं रणे द्रोणं जघ्नुः पाण्डवसृञ्जय़ाः |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा निपुणमस्त्रेषु सर्वशस्त्रभृतामपि ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
रथभङ्गो वभूवास्य धनुर्वाशीर्यतास्यतः |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रमत्तो वाभवद्द्रोणस्ततो मृत्युमुपेय़िवान् ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं नु पार्षतस्तात शत्रुभिर्दुष्प्रधर्षणम् |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
किरन्तमिषुसङ्घातान्रुक्मपुङ्खाननेकशः ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
क्षिप्रहस्तं द्विजश्रेष्ठं कृतिनं चित्रय़ोधिनम् |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दूरेषुपातिनं दान्तमस्त्रय़ुद्धे च पारगम् ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पाञ्चालपुत्रो न्यवधीद्दिष्ट्या स वरमच्युतम् |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कुर्वाणं दारुणं कर्म रणे यत्तं महारथम् ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्यक्तं दिष्टं हि वलवत्पौरुषादिति मे मतिः |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यद्द्रोणो निहतः शूरः पार्षतेन महात्मना ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अस्त्रं चतुर्विधं वीरे यस्मिन्नासीत्प्रतिष्ठितम् |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तमिष्वस्त्रवराचार्यं द्रोणं शंससि मे हतम् ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
श्रुत्वा हतं रुक्मरथं वैय़ाघ्रपरिवारणम् |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जातरूपपरिष्कारं नाद्य शोकमपानुदे ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न नूनं परदुःखेन कश्चिन्म्रिय़ति सञ्जय़ |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यत्र द्रोणमहं श्रुत्वा हतं जीवामि न म्रिय़े ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अश्मसारमय़ं नूनं हृदय़ं सुदृढं मम |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
यच्छ्रुत्वा निहतं द्रोणं शतधा न विदीर्यते ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्राह्मे वेदे तथेष्वस्त्रे यमुपासन्गुणार्थिनः |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
व्राह्मणा राजपुत्राश्च स कथं मृत्युना हतः ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
शोषणं सागरस्येव मेरोरिव विसर्पणम् |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पतनं भास्करस्येव न मृष्ये द्रोणपातनम् ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दृप्तानां प्रतिषेद्धासीद्धार्मिकानां च रक्षिता |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
योऽत्याक्षीत्कृपणस्यार्थे प्राणानपि परन्तपः ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मन्दानां मम पुत्राणां जय़ाशा यस्य विक्रमे |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वृहस्पत्युशनस्तुल्यो वुद्ध्या स निहतः कथम् ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ते च शोणा वृहन्तोऽश्वाः सैन्धवा हेममालिनः |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
रथे वातजवा युक्ताः सर्वशव्दातिगा रणे ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वलिनो घोषिणो दान्ताः सैन्धवाः साधुवाहिनः |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दृढाः सङ्ग्राममध्येषु कच्चिदासन्न विह्वलाः ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
करिणां वृंहतां युद्धे शङ्खदुन्दुभिनिस्वनम् |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ज्याक्षेपशरवर्षाणां शस्त्राणां च सहिष्णवः ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आशंसन्तः पराञ्जेतुं जितश्वासा जितव्यथाः |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
हय़ाः प्रजविताः शीघ्रा भारद्वाजरथोद्वहाः ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ते स्म रुक्मरथे युक्ता नरवीरसमाहिताः |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं नाभ्यतरंस्तात पाण्डवानामनीकिनीम् ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
जातरूपपरिष्कारमास्थाय़ रथमुत्तमम् |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
भारद्वाजः किमकरोच्छूरः सङ्क्रन्दनो युधि ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विद्यां यस्योपजीवन्ति सर्वलोकधनुर्भृतः |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स सत्यसन्धो वलवान्द्रोणः किमकरोद्युधि ||
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दिवि शक्रमिव श्रेष्ठं महामात्रं धनुर्भृताम् |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
के नु तं रौद्रकर्माणं युद्धे प्रत्युद्ययू रथाः ||
२२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ननु रुक्मरथं दृष्ट्वा प्रद्रवन्ति स्म पाण्डवाः |
२३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं सेनां क्षिण्वन्तमव्ययम् ||
२३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
उताहो सर्वसैन्येन धर्मराजः सहानुजः |
२४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पाञ्चाल्यप्रग्रहो द्रोणं सर्वतः समवारय़त् ||
२४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नूनमावारय़त्पार्थो रथिनोऽन्यानजिह्मगैः |
२५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ततो द्रोणं समारोहत्पार्षतः पापकर्मकृत् ||
२५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न ह्यन्यं परिपश्यामि वधे कञ्चन शुष्मिणः |
२६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
धृष्टद्युम्नादृते रौद्रात्पाल्यमानात्किरीटिना ||
२६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तैर्वृतः सर्वतः शूरैः पाञ्चाल्यापसदस्ततः |
२७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
केकय़ैश्चेदिकारूषैर्मत्स्यैरन्यैश्च भूमिपैः ||
२७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्याकुलीकृतमाचार्यं पिपीलैरुरगं यथा |
२८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्मण्यसुकरे सक्तं जघानेति मतिर्मम ||
२८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
योऽधीत्य चतुरो वेदान्सर्वानाख्यानपञ्चमान् |
२९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
व्राह्मणानां प्रतिष्ठासीत्स्रोतसामिव सागरः |
२९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स कथं व्राह्मणो वृद्धः शस्त्रेण वधमाप्तवान् ||
२९ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
अमर्षणो मर्षितवान्क्लिश्यमानः सदा मय़ा |
३० क
धृतराष्ट्र उवाच:
अनर्हमाणः कौन्तेय़ः कर्मणस्तस्य तत्फलम् ||
३० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्य कर्मानुजीवन्ति लोके सर्वधनुर्भृतः |
३१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स सत्यसन्धः सुकृती श्रीकामैर्निहतः कथम् ||
३१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दिवि शक्र इव श्रेष्ठो महासत्त्वो महावलः |
३२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स कथं निहतः पार्थैः क्षुद्रमत्स्यैर्यथा तिमिः ||
३२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
क्षिप्रहस्तश्च वलवान्दृढधन्वारिमर्दनः |
३३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न यस्य जीविताकाङ्क्षी विषय़ं प्राप्य जीवति ||
३३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यं द्वौ न जहतः शव्दौ जीवमानं कदाचन |
३४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
व्राह्मश्च वेदकामानां ज्याघोषश्च धनुर्भृताम् ||
३४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नाहं मृष्ये हतं द्रोणं सिंहद्विरदविक्रमम् |
३५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं सञ्जय़ दुर्धर्षमनाधृष्ययशोवलम् ||
३५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं सव्यं के च महात्मनः |
३६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पुरस्तात्के च वीरस्य युध्यमानस्य संय़ुगे ||
३६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
के च तत्र तनुं त्यक्त्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन् |
३७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रोणस्य समरे वीराः केऽकुर्वन्त परां धृतिम् ||
३७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एतदार्येण कर्तव्यं कृच्छ्रास्वापत्सु सञ्जय़ |
३८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पराक्रमेद्यथाशक्त्या तच्च तस्मिन्प्रतिष्ठितम् ||
३८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मुह्यते मे मनस्तात कथा तावन्निवर्त्यताम् |
३९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भूय़स्तु लव्धसञ्ज्ञस्त्वा परिप्रक्ष्यामि सञ्जय़ ||
३९ ख