मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तां भर्तृशोकार्तां दीनां मलिनवाससम् |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मणिशेषाभ्यलङ्कारां रुदतीं च पतिव्रताम् ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
राक्षसीभिरुपास्यन्तीं समासीनां शिलातले |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणः कामवाणार्तो ददर्शोपससर्प च ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवदानवगन्धर्वय़क्षकिम्पुरुषैर्युधि |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अजितोऽशोकवनिकां यय़ौ कन्दर्पमोहितः ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दिव्याम्वरधरः श्रीमान्सुमृष्टमणिकुण्डलः |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विचित्रमाल्यमुकुटो वसन्त इव मूर्तिमान् ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स कल्पवृक्षसदृशो यत्नादपि विभूषितः |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्मशानचैत्यद्रुमवद्भूषितोऽपि भय़ङ्करः ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तस्यास्तनुमध्याय़ाः समीपे रजनीचरः |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददृशे रोहिणीमेत्य शनैश्चर इव ग्रहः ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तामामन्त्र्य सुश्रोणीं पुष्पकेतुशराहतः |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इदमित्यव्रवीद्वालां त्रस्तां रौहीमिवावलाम् ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीते पर्याप्तमेतावत्कृतो भर्तुरनुग्रहः |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रसादं कुरु तन्वङ्गि क्रिय़तां परिकर्म ते ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भजस्व मां वरारोहे महार्हाभरणाम्वरा |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भव मे सर्वनारीणामुत्तमा वरवर्णिनि ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सन्ति मे देवकन्याश्च राजर्षीणां तथाङ्गनाः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सन्ति दानवकन्याश्च दैत्यानां चापि योषितः ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
चतुर्दश पिशाचानां कोट्यो मे वचने स्थिताः |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्विस्तावत्पुरुषादानां रक्षसां भीमकर्मणाम् ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो मे त्रिगुणा यक्षा ये मद्वचनकारिणः |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
केचिदेव धनाध्यक्षं भ्रातरं मे समाश्रिताः ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गन्धर्वाप्सरसो भद्रे मामापानगतं सदा |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उपतिष्ठन्ति वामोरु यथैव भ्रातरं मम ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुत्रोऽहमपि विप्रर्षेः साक्षाद्विश्रवसो मुनेः |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पञ्चमो लोकपालानामिति मे प्रथितं यशः ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दिव्यानि भक्ष्यभोज्यानि पानानि विविधानि च |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यथैव त्रिदशेशस्य तथैव मम भामिनि ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षीय़तां दुष्कृतं कर्म वनवासकृतं तव |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भार्या मे भव सुश्रोणि यथा मन्दोदरी तथा ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्ता तेन वैदेही परिवृत्य शुभानना |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तृणमन्तरतः कृत्वा तमुवाच निशाचरम् ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अशिवेनातिवामोरूरजस्रं नेत्रवारिणा |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्तनावपतितौ वाला सहितावभिवर्षती |
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उवाच वाक्यं तं क्षुद्रं वैदेही पतिदेवता ||
१८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
असकृद्वदतो वाक्यमीदृशं राक्षसेश्वर |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विषादय़ुक्तमेतत्ते मय़ा श्रुतमभाग्यया ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तद्भद्रसुख भद्रं ते मानसं विनिवर्त्यताम् |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
परदारास्म्यलभ्या च सततं च पतिव्रता ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न चैवोपय़िकी भार्या मानुषी कृपणा तव |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विवशां धर्षय़ित्वा च कां त्वं प्रीतिमवाप्स्यसि ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रजापतिसमो विप्रो व्रह्मय़ोनिः पिता तव |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
न च पालय़से धर्मं लोकपालसमः कथम् ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भ्रातरं राजराजानं महेश्वरसखं प्रभुम् |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धनेश्वरं व्यपदिशन्कथं त्विह न लज्जसे ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्त्वा प्रारुदत्सीता कम्पय़न्ती पय़ोधरौ |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शिरोधरां च तन्वङ्गी मुखं प्रच्छाद्य वाससा ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्या रुदत्या भामिन्या दीर्घा वेणी सुसंय़ता |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददृशे स्वसिता स्निग्धा काली व्यालीव मूर्धनि ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तच्छ्रुत्वा रावणो वाक्यं सीतय़ोक्तं सुनिष्ठुरम् |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रत्याख्यातोऽपि दुर्मेधाः पुनरेवाव्रवीद्वचः ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
काममङ्गानि मे सीते दुनोतु मकरध्वजः |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
न त्वामकामां सुश्रोणीं समेष्ये चारुहासिनीम् ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
किं नु शक्यं मय़ा कर्तुं यत्त्वमद्यापि मानुषम् |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आहारभूतमस्माकं राममेवानुरुध्यसे ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्त्वा तामनिन्द्याङ्गीं स राक्षसगणेश्वरः |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्रैवान्तर्हितो भूत्वा जगामाभिमतां दिशम् ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
राक्षसीभिः परिवृता वैदेही शोककर्शिता |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सेव्यमाना त्रिजटय़ा तत्रैव न्यवसत्तदा ||
३० ख