chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ६८
युधिष्ठिर उवाच:
किमाहुर्दैवतं विप्रा राजानं भरतर्षभ |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
मनुष्याणामधिपतिं तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
२ क
भीष्म उवाच:
वृहस्पतिं वसुमना यथा पप्रच्छ भारत ||
२ ख
भीष्म उवाच:
राजा वसुमना नाम कौसल्यो धीमतां वरः |
३ क
भीष्म उवाच:
महर्षिं परिपप्रच्छ कृतप्रज्ञो वृहस्पतिम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
सर्वं वैनय़िकं कृत्वा विनय़ज्ञो वृहस्पतेः |
४ क
भीष्म उवाच:
दक्षिणानन्तरो भूत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
विधिं पप्रच्छ राज्यस्य सर्वभूतहिते रतः |
५ क
भीष्म उवाच:
प्रजानां हितमन्विच्छन्धर्ममूलं विशां पते ||
५ ख
भीष्म उवाच:
केन भूतानि वर्धन्ते क्षय़ं गच्छन्ति केन च |
६ क
भीष्म उवाच:
कमर्चन्तो महाप्राज्ञ सुखमत्यन्तमाप्नुय़ुः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
इति पृष्टो महाराज्ञा कौसल्येनामितौजसा |
७ क
भीष्म उवाच:
राजसत्कारमव्यग्रः शशंसास्मै वृहस्पतिः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
राजमूलो महाराज धर्मो लोकस्य लक्ष्यते |
८ क
भीष्म उवाच:
प्रजा राजभय़ादेव न खादन्ति परस्परम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
राजा ह्येवाखिलं लोकं समुदीर्णं समुत्सुकम् |
९ क
भीष्म उवाच:
प्रसादय़ति धर्मेण प्रसाद्य च विराजते ||
९ ख
भीष्म उवाच:
यथा ह्यनुदय़े राजन्भूतानि शशिसूर्ययोः |
१० क
भीष्म उवाच:
अन्धे तमसि मज्जेय़ुरपश्यन्तः परस्परम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
यथा ह्यनुदके मत्स्या निराक्रन्दे विहङ्गमाः |
११ क
भीष्म उवाच:
विहरेय़ुर्यथाकाममभिसृत्य पुनः पुनः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
विमथ्यातिक्रमेरंश्च विषह्यापि परस्परम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
अभावमचिरेणैव गच्छेय़ुर्नात्र संशय़ः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
एवमेव विना राज्ञा विनश्येय़ुरिमाः प्रजाः |
१३ क
भीष्म उवाच:
अन्धे तमसि मज्जेय़ुरगोपाः पशवो यथा ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
हरेय़ुर्वलवन्तो हि दुर्वलानां परिग्रहान् |
१४ क
भीष्म उवाच:
हन्युर्व्याय़च्छमानांश्च यदि राजा न पालय़ेत् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
यानं वस्त्रमलङ्कारान्रत्नानि विविधानि च |
१५ क
भीष्म उवाच:
हरेय़ुः सहसा पापा यदि राजा न पालय़ेत् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ममेदमिति लोकेऽस्मिन्न भवेत्सम्परिग्रहः |
१६ क
भीष्म उवाच:
विश्वलोपः प्रवर्तेत यदि राजा न पालय़ेत् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
क्लिश्नीय़ुरपि हिंस्युर्वा यदि राजा न पालय़ेत् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
पतेद्वहुविधं शस्त्रं वहुधा धर्मचारिषु |
१८ क
भीष्म उवाच:
अधर्मः प्रगृहीतः स्याद्यदि राजा न पालय़ेत् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
वधवन्धपरिक्लेशो नित्यमर्थवतां भवेत् |
१९ क
भीष्म उवाच:
ममत्वं च न विन्देय़ुर्यदि राजा न पालय़ेत् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
अन्तश्चाकाशमेव स्याल्लोकोऽय़ं दस्युसाद्भवेत् |
२० क
भीष्म उवाच:
पतेच्च नरकं घोरं यदि राजा न पालय़ेत् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
न योनिपोषो वर्तेत न कृषिर्न वणिक्पथः |
२१ क
भीष्म उवाच:
मज्जेद्धर्मस्त्रय़ी न स्याद्यदि राजा न पालय़ेत् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
न यज्ञाः सम्प्रवर्तेरन्विधिवत्स्वाप्तदक्षिणाः |
२२ क
भीष्म उवाच:
न विवाहाः समाजा वा यदि राजा न पालय़ेत् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
न वृषाः सम्प्रवर्तेरन्न मथ्येरंश्च गर्गराः |
२३ क
भीष्म उवाच:
घोषाः प्रणाशं गच्छेय़ुर्यदि राजा न पालय़ेत् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
त्रस्तमुद्विग्नहृदय़ं हाहाभूतमचेतनम् |
२४ क
भीष्म उवाच:
क्षणेन विनशेत्सर्वं यदि राजा न पालय़ेत् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेय़ुरकुतोभय़ाः |
२५ क
भीष्म उवाच:
विधिवद्दक्षिणावन्ति यदि राजा न पालय़ेत् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणाश्चतुरो वेदान्नाधीय़ेरंस्तपस्विनः |
२६ क
भीष्म उवाच:
विद्यास्नातास्तपःस्नाता यदि राजा न पालय़ेत् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
हस्तो हस्तं स मुष्णीय़ाद्भिद्येरन्सर्वसेतवः |
२७ क
भीष्म उवाच:
भय़ार्तं विद्रवेत्सर्वं यदि राजा न पालय़ेत् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
न लभेद्धर्मसंश्लेषं हतविप्रहतो जनः |
२८ क
भीष्म उवाच:
कर्ता स्वेच्छेन्द्रिय़ो गच्छेद्यदि राजा न पालय़ेत् ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
अनय़ाः सम्प्रवर्तेरन्भवेद्वै वर्णसङ्करः |
२९ क
भीष्म उवाच:
दुर्भिक्षमाविशेद्राष्ट्रं यदि राजा न पालय़ेत् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
विवृत्य हि यथाकामं गृहद्वाराणि शेरते |
३० क
भीष्म उवाच:
मनुष्या रक्षिता राज्ञा समन्तादकुतोभय़ाः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
नाक्रुष्टं सहते कश्चित्कुतो हस्तस्य लङ्घनम् |
३१ क
भीष्म उवाच:
यदि राजा मनुष्येषु त्राता भवति धार्मिकः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रिय़श्चापुरुषा मार्गं सर्वालङ्कारभूषिताः |
३२ क
भीष्म उवाच:
निर्भय़ाः प्रतिपद्यन्ते यदा रक्षति भूमिपः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
धर्ममेव प्रपद्यन्ते न हिंसन्ति परस्परम् |
३३ क
भीष्म उवाच:
अनुगृह्णन्ति चान्योन्यं यदा रक्षति भूमिपः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
यजन्ते च त्रय़ो वर्णा महाय़ज्ञैः पृथग्विधैः |
३४ क
भीष्म उवाच:
युक्ताश्चाधीय़ते शास्त्रं यदा रक्षति भूमिपः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
वार्तामूलो ह्ययं लोकस्त्रय़्या वै धार्यते सदा |
३५ क
भीष्म उवाच:
तत्सर्वं वर्तते सम्यग्यदा रक्षति भूमिपः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
यदा राजा धुरं श्रेष्ठामादाय़ वहति प्रजाः |
३६ क
भीष्म उवाच:
महता वलय़ोगेन तदा लोकः प्रसीदति ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
यस्याभावे च भूतानामभावः स्यात्समन्ततः |
३७ क
भीष्म उवाच:
भावे च भावो नित्यः स्यात्कस्तं न प्रतिपूजय़ेत् ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
तस्य यो वहते भारं सर्वलोकसुखावहम् |
३८ क
भीष्म उवाच:
तिष्ठेत्प्रिय़हिते राज्ञ उभौ लोकौ हि यो जय़ेत् ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
यस्तस्य पुरुषः पापं मनसाप्यनुचिन्तय़ेत् |
३९ क
भीष्म उवाच:
असंशय़मिह क्लिष्टः प्रेत्यापि नरकं पतेत् ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
न हि जात्ववमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः |
४० क
भीष्म उवाच:
महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ||
४० ख
भीष्म उवाच:
कुरुते पञ्च रूपाणि कालय़ुक्तानि यः सदा |
४१ क
भीष्म उवाच:
भवत्यग्निस्तथादित्यो मृत्युर्वैश्रवणो यमः ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
यदा ह्यासीदतः पापान्दहत्युग्रेण तेजसा |
४२ क
भीष्म उवाच:
मिथ्योपचरितो राजा तदा भवति पावकः ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
यदा पश्यति चारेण सर्वभूतानि भूमिपः |
४३ क
भीष्म उवाच:
क्षेमं च कृत्वा व्रजति तदा भवति भास्करः ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
अशुचींश्च यदा क्रुद्धः क्षिणोति शतशो नरान् |
४४ क
भीष्म उवाच:
सपुत्रपौत्रान्सामात्यांस्तदा भवति सोऽन्तकः ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
यदा त्वधार्मिकान्सर्वांस्तीक्ष्णैर्दण्डैर्निय़च्छति |
४५ क
भीष्म उवाच:
धार्मिकांश्चानुगृह्णाति भवत्यथ यमस्तदा ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
यदा तु धनधाराभिस्तर्पय़त्युपकारिणः |
४६ क
भीष्म उवाच:
आच्छिनत्ति च रत्नानि विविधान्यपकारिणाम् ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
श्रिय़ं ददाति कस्मैचित्कस्माच्चिदपकर्षति |
४७ क
भीष्म उवाच:
तदा वैश्रवणो राजँल्लोके भवति भूमिपः ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
नास्यापवादे स्थातव्यं दक्षेणाक्लिष्टकर्मणा |
४८ क
भीष्म उवाच:
धर्म्यमाकाङ्क्षता लाभमीश्वरस्यानसूय़ता ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
न हि राज्ञः प्रतीपानि कुर्वन्सुखमवाप्नुय़ात् |
४९ क
भीष्म उवाच:
पुत्रो भ्राता वय़स्यो वा यद्यप्यात्मसमो भवेत् ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
कुर्यात्कृष्णगतिः शेषं ज्वलितोऽनिलसारथिः |
५० क
भीष्म उवाच:
न तु राज्ञाभिपन्नस्य शेषं क्वचन विद्यते ||
५० ख