देवा ऊचुः:
प्रमर्दितानां वृत्रेण देवानां देवसत्तम |
५१ क
देवा ऊचुः:
गतिर्भव सुरश्रेष्ठ त्राहि नो महतो भय़ात् ||
५१ ख
द्रोण उवाच:
अथ पार्श्वे स्थितं विष्णुं शक्रादींश्च सुरोत्तमान् |
५२ क
द्रोण उवाच:
प्राह तथ्यमिदं वाक्यं विषण्णान्सुरसत्तमान् ||
५२ ख
द्रोण उवाच:
रक्ष्या मे सततं देवाः सहेन्द्राः सद्विजातय़ः |
५३ क
द्रोण उवाच:
त्वष्टुः सुदुर्धरं तेजो येन वृत्रो विनिर्मितः ||
५३ ख
द्रोण उवाच:
त्वष्ट्रा पुरा तपस्तप्त्वा वर्षाय़ुतशतं तदा |
५४ क
द्रोण उवाच:
वृत्रो विनिर्मितो देवाः प्राप्यानुज्ञां महेश्वरात् ||
५४ ख
द्रोण उवाच:
स तस्यैव प्रसादाद्वै हन्यादेव रिपुर्वली |
५५ क
द्रोण उवाच:
नागत्वा शङ्करस्थानं भगवान्दृश्यते हरः ||
५५ ख
द्रोण उवाच:
दृष्ट्वा हनिष्यथ रिपुं क्षिप्रं गच्छत मन्दरम् |
५६ क
द्रोण उवाच:
यत्रास्ते तपसां योनिर्दक्षय़ज्ञविनाशनः |
५६ ख
द्रोण उवाच:
पिनाकी सर्वभूतेशो भगनेत्रनिपातनः ||
५६ ग
द्रोण उवाच:
ते गत्वा सहिता देवा व्रह्मणा सह मन्दरम् |
५७ क
द्रोण उवाच:
अपश्यंस्तेजसां राशिं सूर्यकोटिसमप्रभम् ||
५७ ख
द्रोण उवाच:
सोऽव्रवीत्स्वागतं देवा व्रूत किं करवाण्यहम् |
५८ क
द्रोण उवाच:
अमोघं दर्शनं मह्यं कामप्राप्तिरतोऽस्तु वः ||
५८ ख
द्रोण उवाच:
एवमुक्तास्तु ते सर्वे प्रत्यूचुस्तं दिवौकसः |
५९ क
द्रोण उवाच:
तेजो हृतं नो वृत्रेण गतिर्भव दिवौकसाम् ||
५९ ख
द्रोण उवाच:
मूर्तीरीक्षष्व नो देव प्रहारैर्जर्जरीकृताः |
६० क
द्रोण उवाच:
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्म गतिर्भव महेश्वर ||
६० ख
महेश्वर उवाच:
विदितं मे यथा देवाः कृत्येय़ं सुमहावला |
६१ क
महेश्वर उवाच:
त्वष्टुस्तेजोभवा घोरा दुर्निवार्याकृतात्मभिः ||
६१ ख
महेश्वर उवाच:
अवश्यं तु मय़ा कार्यं साह्यं सर्वदिवौकसाम् |
६२ क
महेश्वर उवाच:
ममेदं गात्रजं शक्र कवचं गृह्य भास्वरम् |
६२ ख
महेश्वर उवाच:
वधानानेन मन्त्रेण मानसेन सुरेश्वर ||
६२ ग
द्रोण उवाच:
इत्युक्त्वा वरदः प्रादाद्वर्म तन्मन्त्रमेव च |
६३ क
द्रोण उवाच:
स तेन वर्मणा गुप्तः प्राय़ाद्वृत्रचमूं प्रति ||
६३ ख
द्रोण उवाच:
नानाविधैश्च शस्त्रौघैः पात्यमानैर्महारणे |
६४ क
द्रोण उवाच:
न सन्धिः शक्यते भेत्तुं वर्मवन्धस्य तस्य तु ||
६४ ख
द्रोण उवाच:
ततो जघान समरे वृत्रं देवपतिः स्वय़म् |
६५ क
द्रोण उवाच:
तं च मत्रमय़ं वन्धं वर्म चाङ्गिरसे ददौ ||
६५ ख
द्रोण उवाच:
अङ्गिराः प्राह पुत्रस्य मन्त्रज्ञस्य वृहस्पतेः |
६६ क
द्रोण उवाच:
वृहस्पतिरथोवाच अग्निवेश्याय़ धीमते ||
६६ ख
द्रोण उवाच:
अग्निवेश्यो मम प्रादात्तेन वध्नामि वर्म ते |
६७ क
द्रोण उवाच:
तवाद्य देहरक्षार्थं मन्त्रेण नृपसत्तम ||
६७ ख
सञ्जय़ उवाच:
एवमुक्त्वा ततो द्रोणस्तव पुत्रं महाद्युतिः |
६८ क
सञ्जय़ उवाच:
पुनरेव वचः प्राह शनैराचार्यपुङ्गवः ||
६८ ख
सञ्जय़ उवाच:
व्रह्मसूत्रेण वध्नामि कवचं तव पार्थिव |
६९ क
सञ्जय़ उवाच:
हिरण्यगर्भेण यथा वद्धं विष्णोः पुरा रणे ||
६९ ख
सञ्जय़ उवाच:
यथा च व्रह्मणा वद्धं सङ्ग्रामे तारकामय़े |
७० क
सञ्जय़ उवाच:
शक्रस्य कवचं दिव्यं तथा वध्नाम्यहं तव ||
७० ख
सञ्जय़ उवाच:
वद्ध्वा तु कवचं तस्य मन्त्रेण विधिपूर्वकम् |
७१ क
सञ्जय़ उवाच:
प्रेषय़ामास राजानं युद्धाय़ महते द्विजः ||
७१ ख
सञ्जय़ उवाच:
स संनद्धो महावाहुराचार्येण महात्मना |
७२ क
सञ्जय़ उवाच:
रथानां च सहस्रेण त्रिगर्तानां प्रहारिणाम् ||
७२ ख
सञ्जय़ उवाच:
तथा दन्तिसहस्रेण मत्तानां वीर्यशालिनाम् |
७३ क
सञ्जय़ उवाच:
अश्वानामय़ुतेनैव तथान्यैश्च महारथैः ||
७३ ख
सञ्जय़ उवाच:
वृतः प्राय़ान्महावाहुरर्जुनस्य रथं प्रति |
७४ क
सञ्जय़ उवाच:
नानावादित्रघोषेण यथा वैरोचनिस्तथा ||
७४ ख
सञ्जय़ उवाच:
ततः शव्दो महानासीत्सैन्यानां तव भारत |
७५ क
सञ्जय़ उवाच:
अगाधं प्रस्थितं दृष्ट्वा समुद्रमिव कौरवम् ||
७५ ख