भीष्म उवाच:
अत्रैव कीर्त्यते सद्भिर्व्राह्मणस्वाभिमर्शने |
१ क
भीष्म उवाच:
नृगेण सुमहत्कृच्छ्रं यदवाप्तं कुरूद्वह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
निविशन्त्यां पुरा पार्थ द्वारवत्यामिति श्रुतिः |
२ क
भीष्म उवाच:
अदृश्यत महाकूपस्तृणवीरुत्समावृतः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
प्रय़त्नं तत्र कुर्वाणास्तस्मात्कूपाज्जलार्थिनः |
३ क
भीष्म उवाच:
श्रमेण महता युक्तास्तस्मिंस्तोय़े सुसंवृते ||
३ ख
भीष्म उवाच:
ददृशुस्ते महाकाय़ं कृकलासमवस्थितम् |
४ क
भीष्म उवाच:
तस्य चोद्धरणे यत्नमकुर्वंस्ते सहस्रशः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
प्रग्रहैश्चर्मपट्टैश्च तं वद्ध्वा पर्वतोपमम् |
५ क
भीष्म उवाच:
नाशक्नुवन्समुद्धर्तुं ततो जग्मुर्जनार्दनम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
खमावृत्योदपानस्य कृकलासः स्थितो महान् |
६ क
भीष्म उवाच:
तस्य नास्ति समुद्धर्तेत्यथ कृष्णे न्यवेदय़न् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
स वासुदेवेन समुद्धृतश्च; पृष्टश्च कामान्निजगाद राजा |
७ क
भीष्म उवाच:
नृगस्तदात्मानमथो न्यवेदय़; त्पुरातनं यज्ञसहस्रय़ाजिनम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तथा व्रुवाणं तु तमाह माधवः; शुभं त्वय़ा कर्म कृतं न पापकम् |
८ क
भीष्म उवाच:
कथं भवान्दुर्गतिमीदृशीं गतो; नरेन्द्र तद्व्रूहि किमेतदीदृशम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
शतं सहस्राणि शतं गवां पुनः; पुनः शतान्यष्ट शताय़ुतानि |
९ क
भीष्म उवाच:
त्वय़ा पुरा दत्तमितीह शुश्रुम; नृप द्विजेभ्यः क्व नु तद्गतं तव ||
९ ख
भीष्म उवाच:
नृगस्ततोऽव्रवीत्कृष्णं व्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः |
१० क
भीष्म उवाच:
प्रोषितस्य परिभ्रष्टा गौरेका मम गोधने ||
१० ख
भीष्म उवाच:
गवां सहस्रे सङ्ख्याता तदा सा पशुपैर्मम |
११ क
भीष्म उवाच:
सा व्राह्मणाय़ मे दत्ता प्रेत्यार्थमभिकाङ्क्षता ||
११ ख
भीष्म उवाच:
अपश्यत्परिमार्गंश्च तां यां परगृहे द्विजः |
१२ क
भीष्म उवाच:
ममेय़मिति चोवाच व्राह्मणो यस्य साभवत् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
तावुभौ समनुप्राप्तौ विवदन्तौ भृशज्वरौ |
१३ क
भीष्म उवाच:
भवान्दाता भवान्हर्तेत्यथ तौ मां तदोचतुः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
शतेन शतसङ्ख्येन गवां विनिमय़ेन वै |
१४ क
भीष्म उवाच:
याचे प्रतिग्रहीतारं स तु मामव्रवीदिदम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
देशकालोपसम्पन्ना दोग्ध्री क्षान्तातिवत्सला |
१५ क
भीष्म उवाच:
स्वादुक्षीरप्रदा धन्या मम नित्यं निवेशने ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
कृशं च भरते या गौर्मम पुत्रमपस्तनम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
न सा शक्या मय़ा हातुमित्युक्त्वा स जगाम ह ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तमपरं विप्रं याचे विनिमय़ेन वै |
१७ क
भीष्म उवाच:
गवां शतसहस्रं वै तत्कृते गृह्यतामिति ||
१७ ख
व्राह्मण उवाच:
न राज्ञां प्रतिगृह्णामि शक्तोऽहं स्वस्य मार्गणे |
१८ क
व्राह्मण उवाच:
सैव गौर्दीय़तां शीघ्रं ममेति मधुसूदन ||
१८ ख
व्राह्मण उवाच:
रुक्ममश्वांश्च ददतो रजतं स्यन्दनांस्तथा |
१९ क
व्राह्मण उवाच:
न जग्राह यय़ौ चापि तदा स व्राह्मणर्षभः ||
१९ ख
व्राह्मण उवाच:
एतस्मिन्नेव काले तु चोदितः कालधर्मणा |
२० क
व्राह्मण उवाच:
पितृलोकमहं प्राप्य धर्मराजमुपागमम् ||
२० ख
व्राह्मण उवाच:
यमस्तु पूजय़ित्वा मां ततो वचनमव्रवीत् |
२१ क
व्राह्मण उवाच:
नान्तः सङ्ख्याय़ते राजंस्तव पुण्यस्य कर्मणः ||
२१ ख
व्राह्मण उवाच:
अस्ति चैव कृतं पापमज्ञानात्तदपि त्वय़ा |
२२ क
व्राह्मण उवाच:
चरस्व पापं पश्चाद्वा पूर्वं वा त्वं यथेच्छसि ||
२२ ख
व्राह्मण उवाच:
रक्षितास्मीति चोक्तं ते प्रतिज्ञा चानृता तव |
२३ क
व्राह्मण उवाच:
व्राह्मणस्वस्य चादानं त्रिविधस्ते व्यतिक्रमः ||
२३ ख
व्राह्मण उवाच:
पूर्वं कृच्छ्रं चरिष्येऽहं पश्चाच्छुभमिति प्रभो |
२४ क
व्राह्मण उवाच:
धर्मराजं व्रुवन्नेवं पतितोऽस्मि महीतले ||
२४ ख
व्राह्मण उवाच:
अश्रौषं प्रच्युतश्चाहं यमस्योच्चैः प्रभाषतः |
२५ क
व्राह्मण उवाच:
वासुदेवः समुद्धर्ता भविता ते जनार्दनः ||
२५ ख
व्राह्मण उवाच:
पूर्णे वर्षसहस्रान्ते क्षीणे कर्मणि दुष्कृते |
२६ क
व्राह्मण उवाच:
प्राप्स्यसे शाश्वताँल्लोकाञ्जितान्स्वेनैव कर्मणा ||
२६ ख
व्राह्मण उवाच:
कूपेऽऽत्मानमधःशीर्षमपश्यं पतितं च ह |
२७ क
व्राह्मण उवाच:
तिर्यग्योनिमनुप्राप्तं न तु मामजहात्स्मृतिः ||
२७ ख
व्राह्मण उवाच:
त्वय़ा तु तारितोऽस्म्यद्य किमन्यत्र तपोवलात् |
२८ क
व्राह्मण उवाच:
अनुजानीहि मां कृष्ण गच्छेय़ं दिवमद्य वै ||
२८ ख
व्राह्मण उवाच:
अनुज्ञातः स कृष्णेन नमस्कृत्य जनार्दनम् |
२९ क
व्राह्मण उवाच:
विमानं दिव्यमास्थाय़ यय़ौ दिवमरिन्दम ||
२९ ख
व्राह्मण उवाच:
ततस्तस्मिन्दिवं प्राप्ते नृगे भरतसत्तम |
३० क
व्राह्मण उवाच:
वासुदेव इमं श्लोकं जगाद कुरुनन्दन ||
३० ख
व्राह्मण उवाच:
व्राह्मणस्वं न हर्तव्यं पुरुषेण विजानता |
३१ क
व्राह्मण उवाच:
व्राह्मणस्वं हृतं हन्ति नृगं व्राह्मणगौरिव ||
३१ ख
व्राह्मण उवाच:
सतां समागमः सद्भिर्नाफलः पार्थ विद्यते |
३२ क
व्राह्मण उवाच:
विमुक्तं नरकात्पश्य नृगं साधुसमागमात् ||
३२ ख
व्राह्मण उवाच:
प्रदानं फलवत्तत्र द्रोहस्तत्र तथाफलः |
३३ क
व्राह्मण उवाच:
अपचारं गवां तस्माद्वर्जय़ेत युधिष्ठिर ||
३३ ख