chevron_left सभा पर्व अध्याय ७१
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं गच्छति कौन्तेय़ो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीमसेनः सव्यसाची माद्रीपुत्रौ च तावुभौ ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
धौम्यश्चैव कथं क्षत्तर्द्रौपदी वा तपस्विनी |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं तेषामङ्गविचेष्टितम् ||
२ ख
विदुर उवाच:
वस्त्रेण संवृत्य मुखं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
३ क
विदुर उवाच:
वाहू विशालौ कृत्वा तु भीमो गच्छति पाण्डवः ||
३ ख
विदुर उवाच:
सिकता वपन्सव्यसाची राजानमनुगच्छति |
४ क
विदुर उवाच:
माद्रीपुत्रः सहदेवो मुखमालिप्य गच्छति ||
४ ख
विदुर उवाच:
पांसूपलिप्तसर्वाङ्गो नकुलश्चित्तविह्वलः |
५ क
विदुर उवाच:
दर्शनीय़तमो लोके राजानमनुगच्छति ||
५ ख
विदुर उवाच:
कृष्णा केशैः प्रतिच्छाद्य मुखमाय़तलोचना |
६ क
विदुर उवाच:
दर्शनीय़ा प्ररुदती राजानमनुगच्छति ||
६ ख
विदुर उवाच:
धौम्यो याम्यानि सामानि रौद्राणि च विशां पते |
७ क
विदुर उवाच:
गाय़न्गच्छति मार्गेषु कुशानादाय़ पाणिना ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विविधानीह रूपाणि कृत्वा गच्छन्ति पाण्डवाः |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तन्ममाचक्ष्व विदुर कस्मादेवं व्रजन्ति ते ||
८ ख
विदुर उवाच:
निकृतस्यापि ते पुत्रैर्हृते राज्ये धनेषु च |
९ क
विदुर उवाच:
न धर्माच्चलते वुद्धिर्धर्मराजस्य धीमतः ||
९ ख
विदुर उवाच:
योऽसौ राजा घृणी नित्यं धार्तराष्ट्रेषु भारत |
१० क
विदुर उवाच:
निकृत्या क्रोधसन्तप्तो नोन्मीलय़ति लोचने ||
१० ख
विदुर उवाच:
नाहं जनं निर्दहेय़ं दृष्ट्वा घोरेण चक्षुषा |
११ क
विदुर उवाच:
स पिधाय़ मुखं राजा तस्माद्गच्छति पाण्डवः ||
११ ख
विदुर उवाच:
यथा च भीमो व्रजति तन्मे निगदतः शृणु |
१२ क
विदुर उवाच:
वाह्वोर्वले नास्ति समो ममेति भरतर्षभ ||
१२ ख
विदुर उवाच:
वाहू विशालौ कृत्वा तु तेन भीमोऽपि गच्छति |
१३ क
विदुर उवाच:
वाहू दर्शय़मानो हि वाहुद्रविणदर्पितः |
१३ ख
विदुर उवाच:
चिकीर्षन्कर्म शत्रुभ्यो वाहुद्रव्यानुरूपतः ||
१३ ग
विदुर उवाच:
प्रदिशञ्शरसम्पातान्कुन्तीपुत्रोऽर्जुनस्तदा |
१४ क
विदुर उवाच:
सिकता वपन्सव्यसाची राजानमनुगच्छति ||
१४ ख
विदुर उवाच:
असक्ताः सिकतास्तस्य यथा सम्प्रति भारत |
१५ क
विदुर उवाच:
असक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु ||
१५ ख
विदुर उवाच:
न मे कश्चिद्विजानीय़ान्मुखमद्येति भारत |
१६ क
विदुर उवाच:
मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवोऽपि गच्छति ||
१६ ख
विदुर उवाच:
नाहं मनांस्याददेय़ं मार्गे स्त्रीणामिति प्रभो |
१७ क
विदुर उवाच:
पांसूपचितसर्वाङ्गो नकुलस्तेन गच्छति ||
१७ ख
विदुर उवाच:
एकवस्त्रा तु रुदती मुक्तकेशी रजस्वला |
१८ क
विदुर उवाच:
शोणिताक्तार्द्रवसना द्रौपदी वाक्यमव्रवीत् ||
१८ ख
विदुर उवाच:
यत्कृतेऽहमिमां प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे |
१९ क
विदुर उवाच:
हतपत्यो हतसुता हतवन्धुजनप्रिय़ाः ||
१९ ख
विदुर उवाच:
वन्धुशोणितदिग्धाङ्ग्यो मुक्तकेश्यो रजस्वलाः |
२० क
विदुर उवाच:
एवं कृतोदका नार्यः प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्वय़म् ||
२० ख
विदुर उवाच:
कृत्वा तु नैरृतान्दर्भान्धीरो धौम्यः पुरोहितः |
२१ क
विदुर उवाच:
सामानि गाय़न्याम्यानि पुरतो याति भारत ||
२१ ख
विदुर उवाच:
हतेषु भारतेष्वाजौ कुरूणां गुरवस्तदा |
२२ क
विदुर उवाच:
एवं सामानि गास्यन्तीत्युक्त्वा धौम्योऽपि गच्छति ||
२२ ख
विदुर उवाच:
हा हा गच्छन्ति नो नाथाः समवेक्षध्वमीदृशम् |
२३ क
विदुर उवाच:
इति पौराः सुदुःखार्ताः क्रोशन्ति स्म समन्ततः ||
२३ ख
विदुर उवाच:
एवमाकारलिङ्गैस्ते व्यवसाय़ं मनोगतम् |
२४ क
विदुर उवाच:
कथय़न्तः स्म कौन्तेय़ा वनं जग्मुर्मनस्विनः ||
२४ ख
विदुर उवाच:
एवं तेषु नराग्र्येषु निर्यत्सु गजसाह्वय़ात् |
२५ क
विदुर उवाच:
अनभ्रे विद्युतश्चासन्भूमिश्च समकम्पत ||
२५ ख
विदुर उवाच:
राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशां पते |
२६ क
विदुर उवाच:
उल्का चाप्यपसव्यं तु पुरं कृत्वा व्यशीर्यत ||
२६ ख
विदुर उवाच:
प्रव्याहरन्ति क्रव्यादा गृध्रगोमाय़ुवाय़साः |
२७ क
विदुर उवाच:
देवाय़तनचैत्येषु प्राकाराट्टालकेषु च ||
२७ ख
विदुर उवाच:
एवमेते महोत्पाता वनं गच्छति पाण्डवे |
२८ क
विदुर उवाच:
भारतानामभावाय़ राजन्दुर्मन्त्रिते तव ||
२८ ख
विदुर उवाच:
नारदश्च सभामध्ये कुरूणामग्रतः स्थितः |
२९ क
विदुर उवाच:
महर्षिभिः परिवृतो रौद्रं वाक्यमुवाच ह ||
२९ ख
विदुर उवाच:
इतश्चतुर्दशे वर्षे विनङ्क्ष्यन्तीह कौरवाः |
३० क
विदुर उवाच:
दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनवलेन च ||
३० ख
विदुर उवाच:
इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन्तरधीय़त |
३१ क
विदुर उवाच:
व्राह्मीं श्रिय़ं सुविपुलां विभ्रद्देवर्षिसत्तमः ||
३१ ख
विदुर उवाच:
ततो दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौवलः |
३२ क
विदुर उवाच:
द्रोणं द्वीपममन्यन्त राज्यं चास्मै न्यवेदय़न् ||
३२ ख
विदुर उवाच:
अथाव्रवीत्ततो द्रोणो दुर्योधनममर्षणम् |
३३ क
विदुर उवाच:
दुःशासनं च कर्णं च सर्वानेव च भारतान् ||
३३ ख
विदुर उवाच:
अवध्यान्पाण्डवानाहुर्देवपुत्रान्द्विजातय़ः |
३४ क
विदुर उवाच:
अहं तु शरणं प्राप्तान्वर्तमानो यथावलम् ||
३४ ख
विदुर उवाच:
गतान्सर्वात्मना भक्त्या धार्तराष्ट्रान्सराजकान् |
३५ क
विदुर उवाच:
नोत्सहे समभित्यक्तुं दैवमूलमतः परम् ||
३५ ख
विदुर उवाच:
धर्मतः पाण्डुपुत्रा वै वनं गच्छन्ति निर्जिताः |
३६ क
विदुर उवाच:
ते च द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति कौरवाः ||
३६ ख
विदुर उवाच:
चरितव्रह्मचर्याश्च क्रोधामर्षवशानुगाः |
३७ क
विदुर उवाच:
वैरं प्रत्यानय़िष्यन्ति मम दुःखाय़ पाण्डवाः ||
३७ ख
विदुर उवाच:
मय़ा तु भ्रंशितो राज्याद्द्रुपदः सखिविग्रहे |
३८ क
विदुर उवाच:
पुत्रार्थमय़जत्क्रोधाद्वधाय़ मम भारत ||
३८ ख
विदुर उवाच:
याजोपय़ाजतपसा पुत्रं लेभे स पावकात् |
३९ क
विदुर उवाच:
धृष्टद्युम्नं द्रौपदीं च वेदीमध्यात्सुमध्यमाम् ||
३९ ख
विदुर उवाच:
ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान्कवची शरी |
४० क
विदुर उवाच:
मर्त्यधर्मतय़ा तस्मादिति मां भय़माविशत् ||
४० ख
विदुर उवाच:
गतो हि पक्षतां तेषां पार्षतः पुरुषर्षभः |
४१ क
विदुर उवाच:
सृष्टप्राणो भृशतरं तस्माद्योत्स्ये तवारिभिः ||
४१ ख
विदुर उवाच:
मद्वधाय़ श्रुतो ह्येष लोके चाप्यतिविश्रुतः |
४२ क
विदुर उवाच:
नूनं सोऽय़मनुप्राप्तस्त्वत्कृते कालपर्ययः ||
४२ ख
विदुर उवाच:
त्वरिताः कुरुत श्रेय़ो नैतदेतावता कृतम् |
४३ क
विदुर उवाच:
मुहूर्तं सुखमेवैतत्तालच्छाय़ेव हैमनी ||
४३ ख
विदुर उवाच:
यजध्वं च महाय़ज्ञैर्भोगानश्नीत दत्त च |
४४ क
विदुर उवाच:
इतश्चतुर्दशे वर्षे महत्प्राप्स्यथ वैशसम् ||
४४ ख
विदुर उवाच:
दुर्योधन निशम्यैतत्प्रतिपद्य यथेच्छसि |
४५ क
विदुर उवाच:
साम वा पाण्डवेय़ेषु प्रय़ुङ्क्ष्व यदि मन्यसे ||
४५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
द्रोणस्य वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रोऽव्रवीदिदम् |
४६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सम्यगाह गुरुः क्षत्तरुपावर्तय़ पाण्डवान् ||
४६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
यदि वा न निवर्तन्ते सत्कृता यान्तु पाण्डवाः |
४७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सशस्त्ररथपादाता भोगवन्तश्च पुत्रकाः ||
४७ ख