chevron_left वन पर्व अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो विनिर्याय़ पुरात्कुम्भकर्णः सहानुगः |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपश्यत्कपिसैन्यं तज्जितकाश्यग्रतः स्थितम् ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमभ्येत्याशु हरय़ः परिवार्य समन्ततः |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभ्यघ्नंश्च महाकाय़ैर्वहुभिर्जगतीरुहैः |
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
करजैरतुदंश्चान्ये विहाय़ भय़मुत्तमम् ||
२ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
वहुधा युध्यमानास्ते युद्धमार्गैः प्लवङ्गमाः |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नानाप्रहरणैर्भीमं राक्षसेन्द्रमताडय़न् ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स ताड्यमानः प्रहसन्भक्षय़ामास वानरान् |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पनसं च गवाक्षं च वज्रवाहुं च वानरम् ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तद्दृष्ट्वा व्यथनं कर्म कुम्भकर्णस्य रक्षसः |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उदक्रोशन्परित्रस्तास्तारप्रभृतय़स्तदा ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं तारमुच्चैः क्रोशन्तमन्यांश्च हरिय़ूथपान् |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिदुद्राव सुग्रीवः कुम्भकर्णमपेतभीः ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽभिपत्य वेगेन कुम्भकर्णं महामनाः |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शालेन जघ्निवान्मूर्ध्नि वलेन कपिकुञ्जरः ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स महात्मा महावेगः कुम्भकर्णस्य मूर्धनि |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विभेद शालं सुग्रीवो न चैवाव्यथय़त्कपिः ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो विनद्य प्रहसञ्शालस्पर्शविवोधितः |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दोर्भ्यामादाय़ सुग्रीवं कुम्भकर्णोऽहरद्वलात् ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ह्रिय़माणं तु सुग्रीवं कुम्भकर्णेन रक्षसा |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अवेक्ष्याभ्यद्रवद्वीरः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽभिपत्य महावेगं रुक्मपुङ्खं महाशरम् |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राहिणोत्कुम्भकर्णाय़ लक्ष्मणः परवीरहा ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तस्य देहावरणं भित्त्वा देहं च साय़कः |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जगाम दारय़न्भूमिं रुधिरेण समुक्षितः ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथा स भिन्नहृदय़ः समुत्सृज्य कपीश्वरम् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुम्भकर्णो महेष्वासः प्रगृहीतशिलाय़ुधः |
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिदुद्राव सौमित्रिमुद्यम्य महतीं शिलाम् ||
१३ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्याभिद्रवतस्तूर्णं क्षुराभ्यामुच्छ्रितौ करौ |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चिच्छेद निशिताग्राभ्यां स वभूव चतुर्भुजः ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तानप्यस्य भुजान्सर्वान्प्रगृहीतशिलाय़ुधान् |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षुरैश्चिच्छेद लघ्वस्त्रं सौमित्रिः प्रतिदर्शय़न् ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स वभूवातिकाय़श्च वहुपादशिरोभुजः |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं व्रह्मास्त्रेण सौमित्रिर्ददाहाद्रिचय़ोपमम् ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स पपात महावीर्यो दिव्यास्त्राभिहतो रणे |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
महाशनिविनिर्दग्धः पादपोऽङ्कुरवानिव ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं दृष्ट्वा वृत्रसङ्काशं कुम्भकर्णं तरस्विनम् |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतासुं पतितं भूमौ राक्षसाः प्राद्रवन्भय़ात् ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथा तान्द्रवतो योधान्दृष्ट्वा तौ दूषणानुजौ |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अवस्थाप्याथ सौमित्रिं सङ्क्रुद्धावभ्यधावताम् ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तावाद्रवन्तौ सङ्क्रुद्धौ वज्रवेगप्रमाथिनौ |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रतिजग्राह सौमित्रिर्विनद्योभौ पतत्रिभिः ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः सुतुमुलं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दूषणानुजय़ोः पार्थ लक्ष्मणस्य च धीमतः ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
महता शरवर्षेण राक्षसौ सोऽभ्यवर्षत |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तौ चापि वीरौ सङ्क्रुद्धावुभौ तौ समवर्षताम् ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मुहूर्तमेवमभवद्वज्रवेगप्रमाथिनोः |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सौमित्रेश्च महावाहोः सम्प्रहारः सुदारुणः ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथाद्रिशृङ्गमादाय़ हनूमान्मारुतात्मजः |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिद्रुत्याददे प्राणान्वज्रवेगस्य रक्षसः ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नीलश्च महता ग्राव्णा दूषणावरजं हरिः |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रमाथिनमभिद्रुत्य प्रममाथ महावलः ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः प्रावर्तत पुनः सङ्ग्रामः कटुकोदय़ः |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामरावणसैन्यानामन्योन्यमभिधावताम् ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शतशो नैरृतान्वन्या जघ्नुर्वन्यांश्च नैरृताः |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नैरृतास्तत्र वध्यन्ते प्राय़शो न तु वानराः ||
२७ ख