chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ७२
युधिष्ठिर उवाच:
कथं राजा प्रजा रक्षन्नाधिवन्धेन युज्यते |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
धर्मे च नापराध्नोति तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
समासेनैव ते तात धर्मान्वक्ष्यामि निश्चितान् |
२ क
भीष्म उवाच:
विस्तरेण हि धर्माणां न जात्वन्तमवाप्नुय़ात् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
धर्मनिष्ठाञ्श्रुतवतो वेदव्रतसमाहितान् |
३ क
भीष्म उवाच:
अर्चितान्वासय़ेथास्त्वं गृहे गुणवतो द्विजान् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
प्रत्युत्थाय़ोपसङ्गृह्य चरणावभिवाद्य च |
४ क
भीष्म उवाच:
अथ सर्वाणि कुर्वीथाः कार्याणि सपुरोहितः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
धर्मकार्याणि निर्वर्त्य मङ्गलानि प्रय़ुज्य च |
५ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणान्वाचय़ेथास्त्वमर्थसिद्धिजय़ाशिषः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
आर्जवेन च सम्पन्नो धृत्या वुद्ध्या च भारत |
६ क
भीष्म उवाच:
अर्थार्थं परिगृह्णीय़ात्कामक्रोधौ च वर्जय़ेत् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
कामक्रोधौ पुरस्कृत्य योऽर्थं राजानुतिष्ठति |
७ क
भीष्म उवाच:
न स धर्मं न चाप्यर्थं परिगृह्णाति वालिशः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
मा स्म लुव्धांश्च मूर्खांश्च कामे चार्थेषु यूय़ुजः |
८ क
भीष्म उवाच:
अलुव्धान्वुद्धिसम्पन्नान्सर्वकर्मसु योजय़ेत् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
मूर्खो ह्यधिकृतोऽर्थेषु कार्याणामविशारदः |
९ क
भीष्म उवाच:
प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन कामद्वेषसमन्वितः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
वलिषष्ठेन शुल्केन दण्डेनाथापराधिनाम् |
१० क
भीष्म उवाच:
शास्त्रनीतेन लिप्सेथा वेतनेन धनागमम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
दापय़ित्वा करं धर्म्यं राष्ट्रं नित्यं यथाविधि |
११ क
भीष्म उवाच:
अशेषान्कल्पय़ेद्राजा योगक्षेमानतन्द्रितः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
गोपाय़ितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
अकामद्वेषसंय़ुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
मा स्माधर्मेण लाभेन लिप्सेथास्त्वं धनागमम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
धर्मार्थावध्रुवौ तस्य योऽपशास्त्रपरो भवेत् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
अपशास्त्रपरो राजा सञ्चय़ान्नाधिगच्छति |
१४ क
भीष्म उवाच:
अस्थाने चास्य तद्वित्तं सर्वमेव विनश्यति ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
अर्थमूलोऽपहिंसां च कुरुते स्वय़मात्मनः |
१५ क
भीष्म उवाच:
करैरशास्त्रदृष्टैर्हि मोहात्सम्पीडय़न्प्रजाः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ऊधश्छिन्द्याद्धि यो धेन्वाः क्षीरार्थी न लभेत्पय़ः |
१६ क
भीष्म उवाच:
एवं राष्ट्रमय़ोगेन पीडितं न विवर्धते ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
यो हि दोग्ध्रीमुपास्ते तु स नित्यं लभते पय़ः |
१७ क
भीष्म उवाच:
एवं राष्ट्रमुपाय़ेन भुञ्जानो लभते फलम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
अथ राष्ट्रमुपाय़ेन भुज्यमानं सुरक्षितम् |
१८ क
भीष्म उवाच:
जनय़त्यतुलां नित्यं कोशवृद्धिं युधिष्ठिर ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
दोग्धि धान्यं हिरण्यं च प्रजा राज्ञि सुरक्षिता |
१९ क
भीष्म उवाच:
नित्यं स्वेभ्यः परेभ्यश्च तृप्ता माता यथा पय़ः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
मालाकारोपमो राजन्भव माङ्गारिकोपमः |
२० क
भीष्म उवाच:
तथा युक्तश्चिरं राष्ट्रं भोक्तुं शक्यसि पालय़न् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
परचक्राभिय़ानेन यदि ते स्याद्धनक्षय़ः |
२१ क
भीष्म उवाच:
अथ साम्नैव लिप्सेथा धनमव्राह्मणेषु यत् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
मा स्म ते व्राह्मणं दृष्ट्वा धनस्थं प्रचलेन्मनः |
२२ क
भीष्म उवाच:
अन्त्याय़ामप्यवस्थाय़ां किमु स्फीतस्य भारत ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
धनानि तेभ्यो दद्यास्त्वं यथाशक्ति यथार्हतः |
२३ क
भीष्म उवाच:
सान्त्वय़न्परिरक्षंश्च स्वर्गमाप्स्यसि दुर्जय़म् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
एवं धर्मेण वृत्तेन प्रजास्त्वं परिपालय़न् |
२४ क
भीष्म उवाच:
स्वन्तं पुण्यं यशोवन्तं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
धर्मेण व्यवहारेण प्रजाः पालय़ पाण्डव |
२५ क
भीष्म उवाच:
युधिष्ठिर तथा युक्तो नाधिवन्धेन योक्ष्यसे ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
एष एव परो धर्मो यद्राजा रक्षते प्रजाः |
२६ क
भीष्म उवाच:
भूतानां हि यथा धर्मे रक्षणं च परा दय़ा ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
तस्मादेवं परं धर्मं मन्यन्ते धर्मकोविदाः |
२७ क
भीष्म उवाच:
यद्राजा रक्षणे युक्तो भूतेषु कुरुते दय़ाम् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
यदह्ना कुरुते पापमरक्षन्भय़तः प्रजाः |
२८ क
भीष्म उवाच:
राजा वर्षसहस्रेण तस्यान्तमधिगच्छति ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
यदह्ना कुरुते पुण्यं प्रजा धर्मेण पालय़न् |
२९ क
भीष्म उवाच:
दश वर्षसहस्राणि तस्य भुङ्क्ते फलं दिवि ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
स्विष्टिः स्वधीतिः सुतपा लोकाञ्जय़ति यावतः |
३० क
भीष्म उवाच:
क्षणेन तानवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालय़न् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
एवं धर्मं प्रय़त्नेन कौन्तेय़ परिपालय़न् |
३१ क
भीष्म उवाच:
इह पुण्यफलं लव्ध्वा नाधिवन्धेन योक्ष्यसे ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
स्वर्गलोके च महतीं श्रिय़ं प्राप्स्यसि पाण्डव |
३२ क
भीष्म उवाच:
असम्भवश्च धर्माणामीदृशानामराजसु |
३२ ख
भीष्म उवाच:
तस्माद्राजैव नान्योऽस्ति यो महत्फलमाप्नुय़ात् ||
३२ ग
भीष्म उवाच:
स राज्यमृद्धिमत्प्राप्य धर्मेण परिपालय़न् |
३३ क
भीष्म उवाच:
इन्द्रं तर्पय़ सोमेन कामैश्च सुहृदो जनान् ||
३३ ख