chevron_left सभा पर्व अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच:
वनं गतेषु पार्थेषु निर्जितेषु दुरोदरे |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
धृतराष्ट्रं महाराज तदा चिन्ता समाविशत् ||
१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तं चिन्तय़ानमासीनं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् |
२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
निःश्वसन्तमनेकाग्रमिति होवाच सञ्जय़ः ||
२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अवाप्य वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिप |
३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रव्राज्य पाण्डवान्राज्याद्राजन्किमनुशोचसि ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अशोच्यं तु कुतस्तेषां येषां वैरं भविष्यति |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पाण्डवैर्युद्धशौण्डैर्हि मित्रवद्भिर्महारथैः ||
४ ख
सञ्जय़ उवाच:
तवेदं सुकृतं राजन्महद्वैरं भविष्यति |
५ क
सञ्जय़ उवाच:
विनाशः सर्वलोकस्य सानुवन्धो भविष्यति ||
५ ख
सञ्जय़ उवाच:
वार्यमाणोऽपि भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च |
६ क
सञ्जय़ उवाच:
पाण्डवानां प्रिय़ां भार्यां द्रौपदीं धर्मचारिणीम् ||
६ ख
सञ्जय़ उवाच:
प्राहिणोदानय़ेहेति पुत्रो दुर्योधनस्तव |
७ क
सञ्जय़ उवाच:
सूतपुत्रं सुमन्दात्मा निर्लज्जः प्रातिकामिनम् ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्मै देवाः प्रय़च्छन्ति पुरुषाय़ पराभवम् |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽपाचीनानि पश्यति ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वुद्धौ कलुषभूताय़ां विनाशे प्रत्युपस्थिते |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अनय़ो नय़सङ्काशो हृदय़ान्नापसर्पति ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अनर्थाश्चार्थरूपेण अर्थाश्चानर्थरूपिणः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
उत्तिष्ठन्ति विनाशान्ते नरं तच्चास्य रोचते ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न कालो दण्डमुद्यम्य शिरः कृन्तति कस्यचित् |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कालस्य वलमेतावद्विपरीतार्थदर्शनम् ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आसादितमिदं घोरं तुमुलं लोमहर्षणम् |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पाञ्चालीमपकर्षद्भिः सभामध्ये तपस्विनीम् ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अय़ोनिजां रूपवतीं कुले जातां विभावरीम् |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
को नु तां सर्वधर्मज्ञां परिभूय़ यशस्विनीम् ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पर्यानय़ेत्सभामध्यमृते दुर्द्यूतदेविनम् |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स्त्रीधर्मिणीं वरारोहां शोणितेन समुक्षिताम् ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एकवस्त्रां च पाञ्चालीं पाण्डवानभ्यवेक्षतीम् |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
हृतस्वान्भ्रष्टचित्तांस्तान्हृतदारान्हृतश्रिय़ः ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विहीनान्सर्वकामेभ्यो दासभाववशं गतान् |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
धर्मपाशपरिक्षिप्तानशक्तानिव विक्रमे ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
क्रुद्धाममर्षितां कृष्णां दुःखितां कुरुसंसदि |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधनश्च कर्णश्च कटुकान्यभ्यभाषताम् ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्याः कृपणचक्षुर्भ्यां प्रदह्येतापि मेदिनी |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अपि शेषं भवेदद्य पुत्राणां मम सञ्जय़ ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भारतानां स्त्रिय़ः सर्वा गान्धार्या सह सङ्गताः |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्राक्रोशन्भैरवं तत्र दृष्ट्वा कृष्णां सभागताम् ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अग्निहोत्राणि साय़ाह्ने न चाहूय़न्त सर्वशः |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
व्राह्मणाः कुपिताश्चासन्द्रौपद्याः परिकर्षणे ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आसीन्निष्टानको घोरो निर्घातश्च महानभूत् |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दिवोल्काश्चापतन्घोरा राहुश्चार्कमुपाग्रसत् |
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अपर्वणि महाघोरं प्रजानां जनय़न्भय़म् ||
२१ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
तथैव रथशालासु प्रादुरासीद्धुताशनः |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ध्वजाश्च व्यवशीर्यन्त भरतानामभूतय़े ||
२२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधनस्याग्निहोत्रे प्राक्रोशन्भैरवं शिवाः |
२३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तास्तदा प्रत्यभाषन्त रासभाः सर्वतोदिशम् ||
२३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रातिष्ठत ततो भीष्मो द्रोणेन सह सञ्जय़ |
२४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कृपश्च सोमदत्तश्च वाह्लीकश्च महारथः ||
२४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ततोऽहमव्रुवं तत्र विदुरेण प्रचोदितः |
२५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वरं ददानि कृष्णाय़ै काङ्क्षितं यद्यदिच्छति ||
२५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अवृणोत्तत्र पाञ्चाली पाण्डवानमितौजसः |
२६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सरथान्सधनुष्कांश्चाप्यनुज्ञासिषमप्यहम् ||
२६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अथाव्रवीन्महाप्राज्ञो विदुरः सर्वधर्मवित् |
२७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
एतदन्ताः स्थ भरता यद्वः कृष्णा सभां गता ||
२७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एषा पाञ्चालराजस्य सुतैषा श्रीरनुत्तमा |
२८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पाञ्चाली पाण्डवानेतान्दैवसृष्टोपसर्पति ||
२८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्याः पार्थाः परिक्लेशं न क्षंस्यन्तेऽत्यमर्षणाः |
२९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वृष्णय़ो वा महेष्वासाः पाञ्चाला वा महौजसः ||
२९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तेन सत्याभिसन्धेन वासुदेवेन रक्षिताः |
३० क
धृतराष्ट्र उवाच:
आगमिष्यति वीभत्सुः पाञ्चालैरभिरक्षितः ||
३० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तेषां मध्ये महेष्वासो भीमसेनो महावलः |
३१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आगमिष्यति धुन्वानो गदां दण्डमिवान्तकः ||
३१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ततो गाण्डीवनिर्घोषं श्रुत्वा पार्थस्य धीमतः |
३२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ||
३२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तत्र मे रोचते नित्यं पार्थैः सार्धं न विग्रहः |
३३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवाञ्शक्तिमत्तरान् ||
३३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा हि वलवान्राजा जरासन्धो महाद्युतिः |
३४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वाहुप्रहरणेनैव भीमेन निहतो युधि ||
३४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ |
३५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उभय़ोः पक्षय़ोर्युक्तं क्रिय़तामविशङ्कय़ा ||
३५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एवं गावल्गणे क्षत्ता धर्मार्थसहितं वचः |
३६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उक्तवान्न गृहीतं च मय़ा पुत्रहितेप्सय़ा ||
३६ ख