chevron_left भीष्म पर्व अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच:
एवं वहुगुणं सैन्यमेवं वहुविधं परम् |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
व्यूढमेवं यथाशास्त्रममोघं चैव सञ्जय़ ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पुष्टमस्माकमत्यन्तमभिकामं च नः सदा |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रह्वमव्यसनोपेतं पुरस्ताद्दृष्टविक्रमम् ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नातिवृद्धमवालं च न कृशं न च पीवरम् |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
लघुवृत्ताय़तप्राय़ं सारगात्रमनामय़म् ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आत्तसंनाहशस्त्रं च वहुशस्त्रपरिग्रहम् |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
असिय़ुद्धे निय़ुद्धे च गदाय़ुद्धे च कोविदम् ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रासर्ष्टितोमरेष्वाजौ परिघेष्वाय़सेषु च |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भिण्डिपालेषु शक्तीषु मुसलेषु च सर्वशः ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कम्पनेषु च चापेषु कणपेषु च सर्वशः |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
क्षेपणीषु च चित्रासु मुष्टिय़ुद्धेषु कोविदम् ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अपरोक्षं च विद्यासु व्याय़ामेषु कृतश्रमम् |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शस्त्रग्रहणविद्यासु सर्वासु परिनिष्ठितम् ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तरप्लुते |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सम्यक्प्रहरणे याने व्यपय़ाने च कोविदम् ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नागाश्वरथय़ानेषु वहुशः सुपरीक्षितम् |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
परीक्ष्य च यथान्याय़ं वेतनेनोपपादितम् ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न गोष्ठ्या नोपचारेण न च वन्धुनिमित्ततः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
न सौहृदवलैश्चापि नाकुलीनपरिग्रहैः ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
समृद्धजनमार्यं च तुष्टसत्कृतवान्धवम् |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कृतोपकारभूय़िष्ठं यशस्वि च मनस्वि च ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सजय़ैश्च नरैर्मुख्यैर्वहुशो मुख्यकर्मभिः |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
लोकपालोपमैस्तात पालितं लोकविश्रुतैः ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वहुभिः क्षत्रिय़ैर्गुप्तं पृथिव्यां लोकसंमतैः |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अस्मानभिगतैः कामात्सवलैः सपदानुगैः ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
महोदधिमिवापूर्णमापगाभिः समन्ततः |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अपक्षैः पक्षसङ्काशै रथैर्नागैश्च संवृतम् ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नानाय़ोधजलं भीमं वाहनोर्मितरङ्गिणम् |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्राससमाकुलम् ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ध्वजभूषणसम्वाधं रत्नपट्टेन सञ्चितम् |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वाहनैः परिसर्पद्भिर्वाय़ुवेगविकम्पितम् ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अपारमिव गर्जन्तं सागरप्रतिमं महत् |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रोणभीष्माभिसङ्गुप्तं गुप्तं च कृतवर्मणा ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कृपदुःशासनाभ्यां च जय़द्रथमुखैस्तथा |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भगदत्तविकर्णाभ्यां द्रौणिसौवलवाह्लिकैः ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
गुप्तं प्रवीरैर्लोकस्य सारवद्भिर्महात्मभिः |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यदहन्यत सङ्ग्रामे दिष्टमेतत्पुरातनम् ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नैतादृशं समुद्योगं दृष्टवन्तोऽथ मानुषाः |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
ऋषय़ो वा महाभागाः पुराणा भुवि सञ्जय़ ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ईदृशो हि वलौघस्तु युक्तः शस्त्रास्त्रसम्पदा |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वध्यते यत्र सङ्ग्रामे किमन्यद्भागधेय़तः ||
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विपरीतमिदं सर्वं प्रतिभाति स्म सञ्जय़ |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यत्रेदृशं वलं घोरं नातरद्युधि पाण्डवान् ||
२२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अथ वा पाण्डवार्थाय़ देवास्तत्र समागताः |
२३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
युध्यन्ते मामकं सैन्यं यदवध्यन्त सञ्जय़ ||
२३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
उक्तो हि विदुरेणेह हितं पथ्यं च सञ्जय़ |
२४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न च गृह्णाति तन्मन्दः पुत्रो दुर्योधनो मम ||
२४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्य मन्ये मतिः पूर्वं सर्वज्ञस्य महात्मनः |
२५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आसीद्यथागतं तात येन दृष्टमिदं पुरा ||
२५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अथ वा भाव्यमेवं हि सञ्जय़ैतेन सर्वथा |
२६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पुरा धात्रा यथा सृष्टं तत्तथा न तदन्यथा ||
२६ ख