chevron_left आश्वमेधिक पर्व अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच:
प्राग्ज्योतिषमथाभ्येत्य व्यचरत्स हय़ोत्तमः |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
भगदत्तात्मजस्तत्र निर्ययौ रणकर्कशः ||
१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स हय़ं पाण्डुपुत्रस्य विषय़ान्तमुपागतम् |
२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
युय़ुधे भरतश्रेष्ठ वज्रदत्तो महीपतिः ||
२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सोऽभिनिर्याय़ नगराद्भगदत्तसुतो नृपः |
३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अश्वमाय़ान्तमुन्मथ्य नगराभिमुखो यय़ौ ||
३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तमालक्ष्य महावाहुः कुरूणामृषभस्तदा |
४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
गाण्डीवं विक्षिपंस्तूर्णं सहसा समुपाद्रवत् ||
४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैरिषुभिर्मोहितो नृपः |
५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
हय़मुत्सृज्य तं वीरस्ततः पार्थमुपाद्रवत् ||
५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
पुनः प्रविश्य नगरं दंशितः स नृपोत्तमः |
६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
आरुह्य नागप्रवरं निर्ययौ युद्धकाङ्क्षय़ा ||
६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि |
७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
दोधूय़ता चामरेण श्वेतेन च महारथः ||
७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततः पार्थं समासाद्य पाण्डवानां महारथम् |
८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
आह्वय़ामास कौरव्यं वाल्यान्मोहाच्च संय़ुगे ||
८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स वारणं नगप्रख्यं प्रभिन्नकरटामुखम् |
९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रेषय़ामास सङ्क्रुद्धस्ततः श्वेतहय़ं प्रति ||
९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
विक्षरन्तं यथा मेघं परवारणवारणम् |
१० क
वैशम्पाय़न उवाच:
शास्त्रवत्कल्पितं सङ्ख्ये त्रिसाहं युद्धदुर्मदम् ||
१० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रचोद्यमानः स गजस्तेन राज्ञा महावलः |
११ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तदाङ्कुशेन विवभावुत्पतिष्यन्निवाम्वरम् ||
११ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य क्रुद्धो राजन्धनञ्जय़ः |
१२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
भूमिष्ठो वारणगतं योधय़ामास भारत ||
१२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
वज्रदत्तस्तु सङ्क्रुद्धो मुमोचाशु धनञ्जय़े |
१३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तोमरानग्निसङ्काशाञ्शलभानिव वेगितान् ||
१३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अर्जुनस्तानसम्प्राप्तान्गाण्डीवप्रेषितैः शरैः |
१४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
द्विधा त्रिधा च चिच्छेद ख एव खगमैस्तदा ||
१४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स तान्दृष्ट्वा तथा छिन्नांस्तोमरान्भगदत्तजः |
१५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
इषूनसक्तांस्त्वरितः प्राहिणोत्पाण्डवं प्रति ||
१५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततोऽर्जुनस्तूर्णतरं रुक्मपुङ्खानजिह्मगान् |
१६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रेषय़ामास सङ्क्रुद्धो भगदत्तात्मजं प्रति ||
१६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स तैर्विद्धो महातेजा वज्रदत्तो महाहवे |
१७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
भृशाहतः पपातोर्व्यां न त्वेनमजहात्स्मृतिः ||
१७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततः स पुनरारुह्य वारणप्रवरं रणे |
१८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अव्यग्रः प्रेषय़ामास जय़ार्थी विजय़ं प्रति ||
१८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तस्मै वाणांस्ततो जिष्णुर्निर्मुक्ताशीविषोपमान् |
१९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रेषय़ामास सङ्क्रुद्धो ज्वलितानिव पावकान् ||
१९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स तैर्विद्धो महानागो विस्रवन्रुधिरं वभौ |
२० क
वैशम्पाय़न उवाच:
हिमवानिव शैलेन्द्रो वहुप्रस्रवणस्तदा ||
२० ख