chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ७५
भीष्म उवाच:
योगक्षेमो हि राष्ट्रस्य राजन्याय़त्त उच्यते |
१ क
भीष्म उवाच:
योगक्षेमश्च राज्ञोऽपि समाय़त्तः पुरोहिते ||
१ ख
भीष्म उवाच:
यतादृष्टं भय़ं व्रह्म प्रजानां शमय़त्युत |
२ क
भीष्म उवाच:
दृष्टं च राजा वाहुभ्यां तद्राष्ट्रं सुखमेधते ||
२ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
३ क
भीष्म उवाच:
मुचुकुन्दस्य संवादं राज्ञो वैश्रवणस्य च ||
३ ख
भीष्म उवाच:
मुचुकुन्दो विजित्येमां पृथिवीं पृथिवीपतिः |
४ क
भीष्म उवाच:
जिज्ञासमानः स्ववलमभ्ययादलकाधिपम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततो वैश्रवणो राजा रक्षांसि समवासृजत् |
५ क
भीष्म उवाच:
ते वलान्यवमृद्नन्तः प्राचरंस्तस्य नैरृताः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स हन्यमाने सैन्ये स्वे मुचुकुन्दो नराधिपः |
६ क
भीष्म उवाच:
गर्हय़ामास विद्वांसं पुरोहितमरिन्दमः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
तत उग्रं तपस्तप्त्वा वसिष्ठो व्रह्मवित्तमः |
७ क
भीष्म उवाच:
रक्षांस्यपावधीत्तत्र पन्थानं चाप्यविन्दत ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ततो वैश्रवणो राजा मुचुकुन्दमदर्शय़त् |
८ क
भीष्म उवाच:
वध्यमानेषु सैन्येषु वचनं चेदमव्रवीत् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
त्वत्तो हि वलिनः पूर्वे राजानः सपुरोहिताः |
९ क
भीष्म उवाच:
न चैवं समवर्तंस्ते यथा त्वमिह वर्तसे ||
९ ख
भीष्म उवाच:
ते खल्वपि कृतास्त्राश्च वलवन्तश्च भूमिपाः |
१० क
भीष्म उवाच:
आगम्य पर्युपासन्ते मामीशं सुखदुःखय़ोः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
यद्यस्ति वाहुवीर्यं ते तद्दर्शय़ितुमर्हसि |
११ क
भीष्म उवाच:
किं व्राह्मणवलेन त्वमतिमात्रं प्रवर्तसे ||
११ ख
भीष्म उवाच:
मुचुकुन्दस्ततः क्रुद्धः प्रत्युवाच धनेश्वरम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
न्याय़पूर्वमसंरव्धमसम्भ्रान्तमिदं वचः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मक्षत्रमिदं सृष्टमेकय़ोनि स्वय़म्भुवा |
१३ क
भीष्म उवाच:
पृथग्वलविधानं च तल्लोकं परिरक्षति ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
तपोमन्त्रवलं नित्यं व्राह्मणेषु प्रतिष्ठितम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
अस्त्रवाहुवलं नित्यं क्षत्रिय़ेषु प्रतिष्ठितम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
ताभ्यां सम्भूय़ कर्तव्यं प्रजानां परिपालनम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
तथा च मां प्रवर्तन्तं गर्हय़स्यलकाधिप ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽव्रवीद्वैश्रवणो राजानं सपुरोहितम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
नाहं राज्यमनिर्दिष्टं कस्मैचिद्विदधाम्युत ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
नाच्छिन्दे चापि निर्दिष्टमिति जानीहि पार्थिव |
१७ क
भीष्म उवाच:
प्रशाधि पृथिवीं वीर मद्दत्तामखिलामिमाम् ||
१७ ख
मुचुकुन्द उवाच:
नाहं राज्यं भवद्दत्तं भोक्तुमिच्छामि पार्थिव |
१८ क
मुचुकुन्द उवाच:
वाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीय़ामिति कामय़े ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
ततो वैश्रवणो राजा विस्मय़ं परमं यय़ौ |
१९ क
भीष्म उवाच:
क्षत्रधर्मे स्थितं दृष्ट्वा मुचुकुन्दमसम्भ्रमम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
ततो राजा मुचुकुन्दः सोऽन्वशासद्वसुन्धराम् |
२० क
भीष्म उवाच:
वाहुवीर्यार्जितां सम्यक्क्षत्रधर्ममनुव्रतः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
एवं यो व्रह्मविद्राजा व्रह्मपूर्वं प्रवर्तते |
२१ क
भीष्म उवाच:
जय़त्यविजितामुर्वीं यशश्च महदश्नुते ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
नित्योदको व्राह्मणः स्यान्नित्यशस्त्रश्च क्षत्रिय़ः |
२२ क
भीष्म उवाच:
तय़ोर्हि सर्वमाय़त्तं यत्किञ्चिज्जगतीगतम् ||
२२ ख