chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय ७७
भीष्म उवाच:
एतस्मिन्नेव काले तु वसिष्ठमृषिसत्तमम् |
१ क
भीष्म उवाच:
इक्ष्वाकुवंशजो राजा सौदासो ददतां वरः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
सर्वलोकचरं सिद्धं व्रह्मकोशं सनातनम् |
२ क
भीष्म उवाच:
पुरोहितमिदं प्रष्टुमभिवाद्योपचक्रमे ||
२ ख
सौदास उवाच:
त्रैलोक्ये भगवन्किं स्वित्पवित्रं कथ्यतेऽनघ |
३ क
सौदास उवाच:
यत्कीर्तय़न्सदा मर्त्यः प्राप्नुय़ात्पुण्यमुत्तमम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
तस्मै प्रोवाच वचनं प्रणताय़ हितं तदा |
४ क
भीष्म उवाच:
गवामुपनिषद्विद्वान्नमस्कृत्य गवां शुचिः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
गावः सुरभिगन्धिन्यस्तथा गुग्गुलुगन्धिकाः |
५ क
भीष्म उवाच:
गावः प्रतिष्ठा भूतानां गावः स्वस्त्ययनं महत् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
गावो भूतं भविष्यच्च गावः पुष्टिः सनातनी |
६ क
भीष्म उवाच:
गावो लक्ष्म्यास्तथा मूलं गोषु दत्तं न नश्यति |
६ ख
भीष्म उवाच:
अन्नं हि सततं गावो देवानां परमं हविः ||
६ ग
भीष्म उवाच:
स्वाहाकारवषट्कारौ गोषु नित्यं प्रतिष्ठितौ |
७ क
भीष्म उवाच:
गावो यज्ञस्य हि फलं गोषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
साय़ं प्रातश्च सततं होमकाले महामते |
८ क
भीष्म उवाच:
गावो ददति वै होम्यमृषिभ्यः पुरुषर्षभ ||
८ ख
भीष्म उवाच:
कानिचिद्यानि दुर्गाणि दुष्कृतानि कृतानि च |
९ क
भीष्म उवाच:
तरन्ति चैव पाप्मानं धेनुं ये ददति प्रभो ||
९ ख
भीष्म उवाच:
एकां च दशगुर्दद्याद्दश दद्याच्च गोशती |
१० क
भीष्म उवाच:
शतं सहस्रगुर्दद्यात्सर्वे तुल्यफला हि ते ||
१० ख
भीष्म उवाच:
अनाहिताग्निः शतगुरय़ज्वा च सहस्रगुः |
११ क
भीष्म उवाच:
समृद्धो यश्च कीनाशो नार्घ्यमर्हन्ति ते त्रय़ः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
कपिलां ये प्रय़च्छन्ति सवत्सां कांस्यदोहनाम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
सुव्रतां वस्त्रसंवीतामुभौ लोकौ जय़न्ति ते ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
युवानमिन्द्रिय़ोपेतं शतेन सह यूथपम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
गवेन्द्रं व्राह्मणेन्द्राय़ भूरिशृङ्गमलङ्कृतम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
वृषभं ये प्रय़च्छन्ति श्रोत्रिय़ाय़ परन्तप |
१४ क
भीष्म उवाच:
ऐश्वर्यं तेऽभिजाय़न्ते जाय़मानाः पुनः पुनः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
नाकीर्तय़ित्वा गाः सुप्यान्नास्मृत्य पुनरुत्पतेत् |
१५ क
भीष्म उवाच:
साय़ं प्रातर्नमस्येच्च गास्ततः पुष्टिमाप्नुय़ात् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
गवां मूत्रपुरीषस्य नोद्विजेत कदाचन |
१६ क
भीष्म उवाच:
न चासां मांसमश्नीय़ाद्गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
गाश्च सङ्कीर्तय़ेन्नित्यं नावमन्येत गास्तथा |
१७ क
भीष्म उवाच:
अनिष्टं स्वप्नमालक्ष्य गां नरः सम्प्रकीर्तय़ेत् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
गोमय़ेन सदा स्नाय़ाद्गोकरीषे च संविशेत् |
१८ क
भीष्म उवाच:
श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि प्रतिघातं च वर्जय़ेत् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
सार्द्रचर्मणि भुञ्जीत निरीक्षन्वारुणीं दिशम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
वाग्यतः सर्पिषा भूमौ गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
घृतेन जुहुय़ादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचय़ेत् |
२० क
भीष्म उवाच:
घृतं दद्याद्घृतं प्राशेद्गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ||
२० ख
भीष्म उवाच:
गोमत्या विद्यया धेनुं तिलानामभिमन्त्र्य यः |
२१ क
भीष्म उवाच:
रसरत्नमय़ीं दद्यान्न स शोचेत्कृताकृते ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
गावो मामुपतिष्ठन्तु हेमशृङ्गाः पय़ोमुचः |
२२ क
भीष्म उवाच:
सुरभ्यः सौरभेय़ाश्च सरितः सागरं यथा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
गावः पश्यन्तु मां नित्यं गावः पश्याम्यहं तदा |
२३ क
भीष्म उवाच:
गावोऽस्माकं वय़ं तासां यतो गावस्ततो वय़म् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
एवं रात्रौ दिवा चैव समेषु विषमेषु च |
२४ क
भीष्म उवाच:
महाभय़ेषु च नरः कीर्तय़न्मुच्यते भय़ात् ||
२४ ख