chevron_left उद्योग पर्व अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच:
उपप्लव्यादिह क्षत्तरुपय़ातो जनार्दनः |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वृकस्थले निवसति स च प्रातरिहेष्यति ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आहुकानामधिपतिः पुरोगः सर्वसात्वताम् |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
महामना महावीर्यो महामात्रो जनार्दनः ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स्फीतस्य वृष्णिवंशस्य भर्ता गोप्ता च माधवः |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
त्रय़ाणामपि लोकानां भगवान्प्रपितामहः ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वृष्ण्यन्धकाः सुमनसो यस्य प्रज्ञामुपासते |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आदित्या वसवो रुद्रा यथा वुद्धिं वृहस्पतेः ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मै पूजां प्रय़ोक्ष्यामि दाशार्हाय़ महात्मने |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रत्यक्षं तव धर्मज्ञ तन्मे कथय़तः शृणु ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एकवर्णैः सुकृष्णाङ्गैर्वाह्लिजातैर्हय़ोत्तमैः |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
चतुर्युक्तान्रथांस्तस्मै रौक्मान्दास्यामि षोडश ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नित्यप्रभिन्नान्मातङ्गानीषादन्तान्प्रहारिणः |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अष्टानुचरमेकैकमष्टौ दास्यामि केशवे ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दासीनामप्रजातानां शुभानां रुक्मवर्चसाम् |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शतमस्मै प्रदास्यामि दासानामपि तावतः ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आविकं वहु सुस्पर्शं पार्वतीय़ैरुपाहृतम् |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तदप्यस्मै प्रदास्यामि सहस्राणि दशाष्ट च ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अजिनानां सहस्राणि चीनदेशोद्भवानि च |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
तान्यप्यस्मै प्रदास्यामि यावदर्हति केशवः ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दिवा रात्रौ च भात्येष सुतेजा विमलो मणिः |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तमप्यस्मै प्रदास्यामि तमप्यर्हति केशवः ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एकेनापि पतत्यह्ना योजनानि चतुर्दश |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यानमश्वतरीय़ुक्तं दास्ये तस्मै तदप्यहम् ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यावन्ति वाहनान्यस्य यावन्तः पुरुषाश्च ते |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ततोऽष्टगुणमप्यस्मै भोज्यं दास्याम्यहं सदा ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मम पुत्राश्च पौत्राश्च सर्वे दुर्योधनादृते |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रत्युद्यास्यन्ति दाशार्हं रथैर्मृष्टैरलङ्कृताः ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स्वलङ्कृताश्च कल्याण्यः पादैरेव सहस्रशः |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वारमुख्या महाभागं प्रत्युद्यास्यन्ति केशवम् ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नगरादपि याः काश्चिद्गमिष्यन्ति जनार्दनम् |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रष्टुं कन्याश्च कल्याण्यस्ताश्च यास्यन्त्यनावृताः ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सस्त्रीपुरुषवालं हि नगरं मधुसूदनम् |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उदीक्षते महात्मानं भानुमन्तमिव प्रजाः ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
महाध्वजपताकाश्च क्रिय़न्तां सर्वतोदिशम् |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जलावसिक्तो विरजाः पन्थास्तस्येति चान्वशात् ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दुःशासनस्य च गृहं दुर्योधनगृहाद्वरम् |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तदस्य क्रिय़तां क्षिप्रं सुसंमृष्टमलङ्कृतम् ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एतद्धि रुचिराकारैः प्रासादैरुपशोभितम् |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
शिवं च रमणीय़ं च सर्वर्तु सुमहाधनम् ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वमस्मिन्गृहे रत्नं मम दुर्योधनस्य च |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यद्यदर्हेत्स वार्ष्णेय़स्तत्तद्देय़मसंशय़म् ||
२१ ख