विदुर उवाच:
राजन्वहुमतश्चासि त्रैलोक्यस्यापि सत्तमः |
१ क
विदुर उवाच:
सम्भावितश्च लोकस्य संमतश्चासि भारत ||
१ ख
विदुर उवाच:
यत्त्वमेवङ्गते व्रूय़ाः पश्चिमे वय़सि स्थितः |
२ क
विदुर उवाच:
शास्त्राद्वा सुप्रतर्काद्वा सुस्थिरः स्थविरो ह्यसि ||
२ ख
विदुर उवाच:
लेखाश्मनीव भाः सूर्ये महोर्मिरिव सागरे |
३ क
विदुर उवाच:
धर्मस्त्वय़ि महान्राजन्निति व्यवसिताः प्रजाः ||
३ ख
विदुर उवाच:
सदैव भावितो लोको गुणौघैस्तव पार्थिव |
४ क
विदुर उवाच:
गुणानां रक्षणे नित्यं प्रय़तस्व सवान्धवः ||
४ ख
विदुर उवाच:
आर्जवं प्रतिपद्यस्व मा वाल्याद्वहुधा नशीः |
५ क
विदुर उवाच:
राज्यं पुत्रांश्च पौत्रांश्च सुहृदश्चापि सुप्रिय़ान् ||
५ ख
विदुर उवाच:
यत्त्वं दित्ससि कृष्णाय़ राजन्नतिथय़े वहु |
६ क
विदुर उवाच:
एतदन्यच्च दाशार्हः पृथिवीमपि चार्हति ||
६ ख
विदुर उवाच:
न तु त्वं धर्ममुद्दिश्य तस्य वा प्रिय़कारणात् |
७ क
विदुर उवाच:
एतदिच्छसि कृष्णाय़ सत्येनात्मानमालभे ||
७ ख
विदुर उवाच:
माय़ैषातत्त्वमेवैतच्छद्मैतद्भूरिदक्षिण |
८ क
विदुर उवाच:
जानामि ते मतं राजन्गूढं वाह्येन कर्मणा ||
८ ख
विदुर उवाच:
पञ्च पञ्चैव लिप्सन्ति ग्रामकान्पाण्डवा नृप |
९ क
विदुर उवाच:
न च दित्ससि तेभ्यस्तांस्तच्छमं कः करिष्यति ||
९ ख
विदुर उवाच:
अर्थेन तु महावाहुं वार्ष्णेय़ं त्वं जिहीर्षसि |
१० क
विदुर उवाच:
अनेनैवाभ्युपाय़ेन पाण्डवेभ्यो विभित्ससि ||
१० ख
विदुर उवाच:
न च वित्तेन शक्योऽसौ नोद्यमेन न गर्हय़ा |
११ क
विदुर उवाच:
अन्यो धनञ्जय़ात्कर्तुमेतत्तत्त्वं व्रवीमि ते ||
११ ख
विदुर उवाच:
वेद कृष्णस्य माहात्म्यं वेदास्य दृढभक्तिताम् |
१२ क
विदुर उवाच:
अत्याज्यमस्य जानामि प्राणैस्तुल्यं धनञ्जय़म् ||
१२ ख
विदुर उवाच:
अन्यत्कुम्भादपां पूर्णादन्यत्पादावसेचनात् |
१३ क
विदुर उवाच:
अन्यत्कुशलसम्प्रश्नान्नैषिष्यति जनार्दनः ||
१३ ख
विदुर उवाच:
यत्त्वस्य प्रिय़मातिथ्यं मानार्हस्य महात्मनः |
१४ क
विदुर उवाच:
तदस्मै क्रिय़तां राजन्मानार्हो हि जनार्दनः ||
१४ ख
विदुर उवाच:
आशंसमानः कल्याणं कुरूनभ्येति केशवः |
१५ क
विदुर उवाच:
येनैव राजन्नर्थेन तदेवास्मा उपाकुरु ||
१५ ख
विदुर उवाच:
शममिच्छति दाशार्हस्तव दुर्योधनस्य च |
१६ क
विदुर उवाच:
पाण्डवानां च राजेन्द्र तदस्य वचनं कुरु ||
१६ ख
विदुर उवाच:
पितासि राजन्पुत्रास्ते वृद्धस्त्वं शिशवः परे |
१७ क
विदुर उवाच:
वर्तस्व पितृवत्तेषु वर्तन्ते ते हि पुत्रवत् ||
१७ ख