chevron_left द्रोण पर्व अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच:
एवं वहुविधं सैन्यमेवं प्रविचितं वरम् |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
व्यूढमेवं यथान्याय़मेवं वहु च सञ्जय़ ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नित्यं पूजितमस्माभिरभिकामं च नः सदा |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रौढमत्यद्भुताकारं पुरस्ताद्दृढविक्रमम् ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नातिवृद्धमवालं च न कृशं नातिपीवरम् |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
लघुवृत्ताय़तप्राणं सारगात्रमनामय़म् ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आत्तसंनाहसम्पन्नं वहुशस्त्रपरिच्छदम् |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शस्त्रग्रहणविद्यासु वह्वीषु परिनिष्ठितम् ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तरप्लुते |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सम्यक्प्रहरणे याने व्यपय़ाने च कोविदम् ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
नागेष्वश्वेषु वहुशो रथेषु च परीक्षितम् |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
परीक्ष्य च यथान्याय़ं वेतनेनोपपादितम् ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न गोष्ठ्या नोपचारेण न सम्वन्धनिमित्ततः |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
नानाहूतो न ह्यभृतो मम सैन्ये वभूव ह ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कुलीनार्यजनोपेतं तुष्टपुष्टमनुद्धतम् |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कृतमानोपकारं च यशस्वि च मनस्वि च ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सचिवैश्चापरैर्मुख्यैर्वहुभिर्मुख्यकर्मभिः |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
लोकपालोपमैस्तात पालितं नरसत्तमैः ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वहुभिः पार्थिवैर्गुप्तमस्मत्प्रिय़चिकीर्षुभिः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
अस्मानभिसृतैः कामात्सवलैः सपदानुगैः ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
महोदधिमिवापूर्णमापगाभिः समन्ततः |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अपक्षैः पक्षिसङ्काशै रथैरश्वैश्च संवृतम् ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
योधाक्षय़्यजलं भीमं वाहनोर्मितरङ्गिणम् |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्रासझषाकुलम् ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ध्वजभूषणसम्वाधं रत्नपट्टेन सञ्चितम् |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वाहनैरपि धावद्भिर्वाय़ुवेगविकम्पितम् ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रोणगम्भीरपातालं कृतवर्ममहाह्रदम् |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जलसन्धमहाग्राहं कर्णचन्द्रोदय़ोद्धतम् ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
गते सैन्यार्णवं भित्त्वा तरसा पाण्डवर्षभे |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सञ्जय़ैकरथेनैव युय़ुधाने च मामकम् ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तत्र शेषं न पश्यामि प्रविष्टे सव्यसाचिनि |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सात्वते च रथोदारे मम सैन्यस्य सञ्जय़ ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तौ तत्र समतिक्रान्तौ दृष्ट्वाभीतौ तरस्विनौ |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सिन्धुराजं च सम्प्रेक्ष्य गाण्डीवस्येषुगोचरे ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
किं तदा कुरवः कृत्यं विदधुः कालचोदिताः |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दारुणैकाय़ने काले कथं वा प्रतिपेदिरे ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ग्रस्तान्हि कौरवान्मन्ये मृत्युना तात सङ्गतान् |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विक्रमो हि रणे तेषां न तथा दृश्यतेऽद्य वै ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अक्षतौ संय़ुगे तत्र प्रविष्टौ कृष्णपाण्डवौ |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
न च वारय़िता कश्चित्तय़ोरस्तीह सञ्जय़ ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भृताश्च वहवो योधाः परीक्ष्यैव महारथाः |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वेतनेन यथाय़ोग्यं प्रिय़वादेन चापरे ||
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अकारणभृतस्तात मम सैन्ये न विद्यते |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्मणा ह्यनुरूपेण लभ्यते भक्तवेतनम् ||
२२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न च योधोऽभवत्कश्चिन्मम सैन्ये तु सञ्जय़ |
२३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अल्पदानभृतस्तात न कुप्यभृतको नरः ||
२३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पूजिता हि यथाशक्त्या दानमानासनैर्मय़ा |
२४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा पुत्रैश्च मे तात ज्ञातिभिश्च सवान्धवैः ||
२४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ते च प्राप्यैव सङ्ग्रामे निर्जिताः सव्यसाचिना |
२५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शैनेय़ेन परामृष्टाः किमन्यद्भागधेय़तः ||
२५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
रक्ष्यते यश्च सङ्ग्रामे ये च सञ्जय़ रक्षिणः |
२६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
एकः साधारणः पन्था रक्ष्यस्य सह रक्षिभिः ||
२६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अर्जुनं समरे दृष्ट्वा सैन्धवस्याग्रतः स्थितम् |
२७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पुत्रो मम भृशं मूढः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ||
२७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सात्यकिं च रणे दृष्ट्वा प्रविशन्तमभीतवत् |
२८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
किं नु दुर्योधनः कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ||
२८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वशस्त्रातिगौ सेनां प्रविष्टौ रथसत्तमौ |
२९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दृष्ट्वा कां वै धृतिं युद्धे प्रत्यपद्यन्त मामकाः ||
२९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दृष्ट्वा कृष्णं तु दाशार्हमर्जुनार्थे व्यवस्थितम् |
३० क
धृतराष्ट्र उवाच:
शिनीनामृषभं चैव मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दृष्ट्वा सेनां व्यतिक्रान्तां सात्वतेनार्जुनेन च |
३१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पलाय़मानांश्च कुरून्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विद्रुतान्रथिनो दृष्ट्वा निरुत्साहान्द्विषज्जय़े |
३२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पलाय़ने कृतोत्साहान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
शून्यान्कृतान्रथोपस्थान्सात्वतेनार्जुनेन च |
३३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
हतांश्च योधान्सन्दृश्य मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्यश्वनागरथान्दृष्ट्वा तत्र वीरान्सहस्रशः |
३४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
धावमानान्रणे व्यग्रान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विवीरांश्च कृतानश्वान्विरथांश्च कृतान्नरान् |
३५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तत्र सात्यकिपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पत्तिसङ्घान्रणे दृष्ट्वा धावमानांश्च सर्वशः |
३६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
निराशा विजय़े सर्वे मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रोणस्य समतिक्रान्तावनीकमपराजितौ |
३७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
क्षणेन दृष्ट्वा तौ वीरौ मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
संमूढोऽस्मि भृशं तात श्रुत्वा कृष्णधनञ्जय़ौ |
३८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रविष्टौ मामकं सैन्यं सात्वतेन सहाच्युतौ ||
३८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मिन्प्रविष्टे पृतनां शिनीनां प्रवरे रथे |
३९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भोजानीकं व्यतिक्रान्ते कथमासन्हि कौरवाः ||
३९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा द्रोणेन समरे निगृहीतेषु पाण्डुषु |
४० क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं युद्धमभूत्तत्र तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
४० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रोणो हि वलवाञ्शूरः कृतास्त्रो दृढविक्रमः |
४१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पाञ्चालास्तं महेष्वासं प्रत्ययुध्यन्कथं रणे ||
४१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वद्धवैरास्तथा द्रोणे धर्मराजजय़ैषिणः |
४२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भारद्वाजस्तथा तेषु कृतवैरो महारथः ||
४२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अर्जुनश्चापि यच्चक्रे सिन्धुराजवधं प्रति |
४३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तन्मे सर्वं समाचक्ष्व कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||
४३ ख