chevron_left उद्योग पर्व अध्याय ९
शल्य उवाच:
ग्रस्ते वृत्रेण शक्रे तु सम्भ्रान्तास्त्रिदशास्तदा |
४७ क
शल्य उवाच:
असृजंस्ते महासत्त्वा जृम्भिकां वृत्रनाशिनीम् ||
४७ ख
शल्य उवाच:
विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादपावृतात् |
४८ क
शल्य उवाच:
स्वान्यङ्गान्यभिसङ्क्षिप्य निष्क्रान्तो वलसूदनः |
४८ ख
शल्य उवाच:
ततः प्रभृति लोकेषु जृम्भिका प्राणिसंश्रिता ||
४८ ग
शल्य उवाच:
जहृषुश्च सुराः सर्वे दृष्ट्वा शक्रं विनिःसृतम् |
४९ क
शल्य उवाच:
ततः प्रववृते युद्धं वृत्रवासवय़ोः पुनः |
४९ ख
शल्य उवाच:
संरव्धय़ोस्तदा घोरं सुचिरं भरतर्षभ ||
४९ ग
शल्य उवाच:
यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो वलसमन्वितः |
५० क
शल्य उवाच:
त्वष्टुस्तपोवलाद्विद्वांस्तदा शक्रो न्यवर्तत ||
५० ख
शल्य उवाच:
निवृत्ते तु तदा देवा विषादमगमन्परम् |
५१ क
शल्य उवाच:
समेत्य शक्रेण च ते त्वष्टुस्तेजोविमोहिताः |
५१ ख
शल्य उवाच:
अमन्त्रय़न्त ते सर्वे मुनिभिः सह भारत ||
५१ ग
शल्य उवाच:
किं कार्यमिति ते राजन्विचिन्त्य भय़मोहिताः |
५२ क
शल्य उवाच:
जग्मुः सर्वे महात्मानं मनोभिर्विष्णुमव्ययम् |
५२ ख
शल्य उवाच:
उपविष्टा मन्दराग्रे सर्वे वृत्रवधेप्सवः ||
५२ ग