chevron_left आदि पर्व अध्याय ९
सूत उवाच:
तेषु तत्रोपविष्टेषु व्राह्मणेषु समन्ततः |
१ क
सूत उवाच:
रुरुश्चुक्रोश गहनं वनं गत्वा सुदुःखितः ||
१ ख
सूत उवाच:
शोकेनाभिहतः सोऽथ विलपन्करुणं वहु |
२ क
सूत उवाच:
अव्रवीद्वचनं शोचन्प्रिय़ां चिन्त्य प्रमद्वराम् ||
२ ख
सूत उवाच:
शेते सा भुवि तन्वङ्गी मम शोकविवर्धिनी |
३ क
सूत उवाच:
वान्धवानां च सर्वेषां किं नु दुःखमतः परम् ||
३ ख
सूत उवाच:
यदि दत्तं तपस्तप्तं गुरवो वा मय़ा यदि |
४ क
सूत उवाच:
सम्यगाराधितास्तेन सञ्जीवतु मम प्रिय़ा ||
४ ख
सूत उवाच:
यथा जन्मप्रभृति वै यतात्माहं धृतव्रतः |
५ क
सूत उवाच:
प्रमद्वरा तथाद्यैव समुत्तिष्ठतु भामिनी ||
५ ख
देवदूत उवाच:
अभिधत्से ह यद्वाचा रुरो दुःखेन तन्मृषा |
६ क
देवदूत उवाच:
न तु मर्त्यस्य धर्मात्मन्नाय़ुरस्ति गताय़ुषः ||
६ ख
देवदूत उवाच:
गताय़ुरेषा कृपणा गन्धर्वाप्सरसोः सुता |
७ क
देवदूत उवाच:
तस्माच्छोके मनस्तात मा कृथास्त्वं कथञ्चन ||
७ ख
देवदूत उवाच:
उपाय़श्चात्र विहितः पूर्वं देवैर्महात्मभिः |
८ क
देवदूत उवाच:
तं यदीच्छसि कर्तुं त्वं प्राप्स्यसीमां प्रमद्वराम् ||
८ ख
रुरुरु उवाच:
क उपाय़ः कृतो देवैर्व्रूहि तत्त्वेन खेचर |
९ क
रुरुरु उवाच:
करिष्ये तं तथा श्रुत्वा त्रातुमर्हति मां भवान् ||
९ ख
देवदूत उवाच:
आय़ुषोऽर्धं प्रय़च्छस्व कन्याय़ै भृगुनन्दन |
१० क
देवदूत उवाच:
एवमुत्थास्यति रुरो तव भार्या प्रमद्वरा ||
१० ख
रुरुरु उवाच:
आय़ुषोऽर्धं प्रय़च्छामि कन्याय़ै खेचरोत्तम |
११ क
रुरुरु उवाच:
शृङ्गाररूपाभरणा उत्तिष्ठतु मम प्रिय़ा ||
११ ख
सूत उवाच:
ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमौ |
१२ क
सूत उवाच:
धर्मराजमुपेत्येदं वचनं प्रत्यभाषताम् ||
१२ ख
सूत उवाच:
धर्मराजाय़ुषोऽर्धेन रुरोर्भार्या प्रमद्वरा |
१३ क
सूत उवाच:
समुत्तिष्ठतु कल्याणी मृतैव यदि मन्यसे ||
१३ ख
धर्मराज उवाच:
प्रमद्वरा रुरोर्भार्या देवदूत यदीच्छसि |
१४ क
धर्मराज उवाच:
उत्तिष्ठत्वाय़ुषोऽर्धेन रुरोरेव समन्विता ||
१४ ख
सूत उवाच:
एवमुक्ते ततः कन्या सोदतिष्ठत्प्रमद्वरा |
१५ क
सूत उवाच:
रुरोस्तस्याय़ुषोऽर्धेन सुप्तेव वरवर्णिनी ||
१५ ख
सूत उवाच:
एतद्दृष्टं भविष्ये हि रुरोरुत्तमतेजसः |
१६ क
सूत उवाच:
आय़ुषोऽतिप्रवृद्धस्य भार्यार्थेऽर्धं ह्रसत्विति ||
१६ ख
सूत उवाच:
तत इष्टेऽहनि तय़ोः पितरौ चक्रतुर्मुदा |
१७ क
सूत उवाच:
विवाहं तौ च रेमाते परस्परहितैषिणौ ||
१७ ख
सूत उवाच:
स लव्ध्वा दुर्लभां भार्यां पद्मकिञ्जल्कसप्रभाम् |
१८ क
सूत उवाच:
व्रतं चक्रे विनाशाय़ जिह्मगानां धृतव्रतः ||
१८ ख
सूत उवाच:
स दृष्ट्वा जिह्मगान्सर्वांस्तीव्रकोपसमन्वितः |
१९ क
सूत उवाच:
अभिहन्ति यथासन्नं गृह्य प्रहरणं सदा ||
१९ ख
सूत उवाच:
स कदाचिद्वनं विप्रो रुरुरभ्यागमन्महत् |
२० क
सूत उवाच:
शय़ानं तत्र चापश्यड्डुण्डुभं वय़सान्वितम् ||
२० ख
सूत उवाच:
तत उद्यम्य दण्डं स कालदण्डोपमं तदा |
२१ क
सूत उवाच:
अभ्यघ्नद्रुषितो विप्रस्तमुवाचाथ डुण्डुभः ||
२१ ख
सूत उवाच:
नापराध्यामि ते किञ्चिदहमद्य तपोधन |
२२ क
सूत उवाच:
संरम्भात्तत्किमर्थं मामभिहंसि रुषान्वितः ||
२२ ख