भीष्म उवाच:
वनस्पतीन्भक्ष्यफलान्न छिन्द्युर्विषय़े तव |
१ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणानां मूलफलं धर्म्यमाहुर्मनीषिणः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणेभ्योऽतिरिक्तं च भुञ्जीरन्नितरे जनाः |
२ क
भीष्म उवाच:
न व्राह्मणोपरोधेन हरेदन्यः कथञ्चन ||
२ ख
भीष्म उवाच:
विप्रश्चेत्त्यागमातिष्ठेदाख्याय़ावृत्तिकर्शितः |
३ क
भीष्म उवाच:
परिकल्प्यास्य वृत्तिः स्यात्सदारस्य नराधिप ||
३ ख
भीष्म उवाच:
स चेन्नोपनिवर्तेत वाच्यो व्राह्मणसंसदि |
४ क
भीष्म उवाच:
कस्मिन्निदानीं मर्यादामय़ं लोकः करिष्यति ||
४ ख
भीष्म उवाच:
असंशय़ं निवर्तेत न चेद्वक्ष्यत्यतः परम् |
५ क
भीष्म उवाच:
पूर्वं परोक्षं कर्तव्यमेतत्कौन्तेय़ शासनम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
आहुरेतज्जना व्रह्मन्न चैतच्छ्रद्दधाम्यहम् |
६ क
भीष्म उवाच:
निमन्त्र्यश्च भवेद्भोगैरवृत्त्या चेत्तदाचरेत् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं लोकानामिह जीवनम् |
७ क
भीष्म उवाच:
ऊर्ध्वं चैव त्रय़ी विद्या सा भूतान्भावय़त्युत ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तस्यां प्रय़तमानाय़ां ये स्युस्तत्परिपन्थिनः |
८ क
भीष्म उवाच:
दस्यवस्तद्वधाय़ेह व्रह्मा क्षत्रमथासृजत् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
शत्रूञ्जहि प्रजा रक्ष यजस्व क्रतुभिर्नृप |
९ क
भीष्म उवाच:
युध्यस्व समरे वीरो भूत्वा कौरवनन्दन ||
९ ख
भीष्म उवाच:
संरक्ष्यान्पालय़ेद्राजा यः स राजार्यकृत्तमः |
१० क
भीष्म उवाच:
ये केचित्तान्न रक्षन्ति तैरर्थो नास्ति कश्चन ||
१० ख
भीष्म उवाच:
सदैव राज्ञा वोद्धव्यं सर्वलोकाद्युधिष्ठिर |
११ क
भीष्म उवाच:
तस्माद्धेतोर्हि भुञ्जीत मनुष्यानेव मानवः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
अन्तरेभ्यः परान्रक्षन्परेभ्यः पुनरन्तरान् |
१२ क
भीष्म उवाच:
परान्परेभ्यः स्वान्स्वेभ्यः सर्वान्पालय़ नित्यदा ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
आत्मानं सर्वतो रक्षन्राजा रक्षेत मेदिनीम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
आत्ममूलमिदं सर्वमाहुर्हि विदुषो जनाः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
किं छिद्रं कोऽनुषङ्गो मे किं वास्त्यविनिपातितम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
कुतो मामास्रवेद्दोष इति नित्यं विचिन्तय़ेत् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
गुप्तैश्चारैरनुमतैः पृथिवीमनुचारय़ेत् |
१५ क
भीष्म उवाच:
सुनीतं यदि मे वृत्तं प्रशंसन्ति न वा पुनः |
१५ ख
भीष्म उवाच:
कच्चिद्रोचेज्जनपदे कच्चिद्राष्ट्रे च मे यशः ||
१५ ग
भीष्म उवाच:
धर्मज्ञानां धृतिमतां सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनाम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
राष्ट्रं च येऽनुजीवन्ति ये च राज्ञोऽनुजीविनः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अमात्यानां च सर्वेषां मध्यस्थानां च सर्वशः |
१७ क
भीष्म उवाच:
ये च त्वाभिप्रशंसेय़ुर्निन्देय़ुरथ वा पुनः |
१७ ख
भीष्म उवाच:
सर्वान्सुपरिणीतांस्तान्कारय़ेत युधिष्ठिर ||
१७ ग
भीष्म उवाच:
एकान्तेन हि सर्वेषां न शक्यं तात रोचितुम् |
१८ क
भीष्म उवाच:
मित्रामित्रमथो मध्यं सर्वभूतेषु भारत ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
तुल्यवाहुवलानां च गुणैरपि निषेविनाम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
कथं स्यादधिकः कश्चित्स तु भुञ्जीत मानवान् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
ये चरा ह्यचरानद्युरदंष्ट्रान्दंष्ट्रिणस्तथा |
२० क
भीष्म उवाच:
आशीविषा इव क्रुद्धा भुजगा भुजगानिव ||
२० ख
भीष्म उवाच:
एतेभ्यश्चाप्रमत्तः स्यात्सदा यत्तो युधिष्ठिर |
२१ क
भीष्म उवाच:
भारुण्डसदृशा ह्येते निपतन्ति प्रमाद्यतः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
कच्चित्ते वणिजो राष्ट्रे नोद्विजन्ते करार्दिताः |
२२ क
भीष्म उवाच:
क्रीणन्तो वहु वाल्पेन कान्तारकृतनिश्रमाः ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
कच्चित्कृषिकरा राष्ट्रं न जहत्यतिपीडिताः |
२३ क
भीष्म उवाच:
ये वहन्ति धुरं राज्ञां सम्भरन्तीतरानपि ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
इतो दत्तेन जीवन्ति देवाः पितृगणास्तथा |
२४ क
भीष्म उवाच:
मनुष्योरगरक्षांसि वय़ांसि पशवस्तथा ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
एषा ते राष्ट्रवृत्तिश्च राष्ट्रगुप्तिश्च भारत |
२५ क
भीष्म उवाच:
एतमेवार्थमाश्रित्य भूय़ो वक्ष्यामि पाण्डव ||
२५ ख