chevron_left वन पर्व अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽविदूरे नलिनीं प्रभूतकमलोत्पलाम् |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीताहरणदुःखार्तः पम्पां रामः समासदत् ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मारुतेन सुशीतेन सुखेनामृतगन्धिना |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सेव्यमानो वने तस्मिञ्जगाम मनसा प्रिय़ाम् ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विललाप स राजेन्द्रस्तत्र कान्तामनुस्मरन् |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कामवाणाभिसन्तप्तः सौमित्रिस्तमथाव्रवीत् ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न त्वामेवंविधो भावः स्प्रष्टुमर्हति मानद |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आत्मवन्तमिव व्याधिः पुरुषं वृद्धशीलिनम् ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रवृत्तिरुपलव्धा ते वैदेह्या रावणस्य च |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तां त्वं पुरुषकारेण वुद्ध्या चैवोपपादय़ ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिगच्छाव सुग्रीवं शैलस्थं हरिपुङ्गवम् |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मय़ि शिष्ये च भृत्ये च सहाय़े च समाश्वस ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवं वहुविधैर्वाक्यैर्लक्ष्मणेन स राघवः |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उक्तः प्रकृतिमापेदे कार्ये चानन्तरोऽभवत् ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निषेव्य वारि पम्पाय़ास्तर्पय़ित्वा पितॄनपि |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रतस्थतुरुभौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तावृश्यमूकमभ्येत्य वहुमूलफलं गिरिम् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
गिर्यग्रे वानरान्पञ्च वीरौ ददृशतुस्तदा ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवः प्रेषय़ामास सचिवं वानरं तय़ोः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वुद्धिमन्तं हनूमन्तं हिमवन्तमिव स्थितम् ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तेन सम्भाष्य पूर्वं तौ सुग्रीवमभिजग्मतुः |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सख्यं वानरराजेन चक्रे रामस्ततो नृप ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तद्वासो दर्शय़ामासुस्तस्य कार्ये निवेदिते |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वानराणां तु यत्सीता ह्रिय़माणाभ्यवासृजत् ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्प्रत्ययकरं लव्ध्वा सुग्रीवं प्लवगाधिपम् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पृथिव्यां वानरैश्वर्ये स्वय़ं रामोऽभ्यषेचय़त् ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रतिजज्ञे च काकुत्स्थः समरे वालिनो वधम् |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवश्चापि वैदेह्याः पुनरानय़नं नृप ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्त्वा समय़ं कृत्वा विश्वास्य च परस्परम् |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभ्येत्य सर्वे किष्किन्धां तस्थुर्युद्धाभिकाङ्क्षिणः ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवः प्राप्य किष्किन्धां ननादौघनिभस्वनः |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नास्य तन्ममृषे वाली तं तारा प्रत्यषेधय़त् ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यथा नदति सुग्रीवो वलवानेष वानरः |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मन्ये चाश्रय़वान्प्राप्तो न त्वं निर्गन्तुमर्हसि ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हेममाली ततो वाली तारां ताराधिपाननाम् |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रोवाच वचनं वाग्मी तां वानरपतिः पतिः ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वभूतरुतज्ञा त्वं पश्य वुद्ध्या समन्विता |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
केनापाश्रय़वान्प्राप्तो ममैष भ्रातृगन्धिकः ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
चिन्तय़ित्वा मुहूर्तं तु तारा ताराधिपप्रभा |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पतिमित्यव्रवीत्प्राज्ञा शृणु सर्वं कपीश्वर ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हृतदारो महासत्त्वो रामो दशरथात्मजः |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तुल्यारिमित्रतां प्राप्तः सुग्रीवेण धनुर्धरः ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भ्राता चास्य महावाहुः सौमित्रिरपराजितः |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
लक्ष्मणो नाम मेधावी स्थितः कार्यार्थसिद्धय़े ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनूमांश्चानिलात्मजः |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जाम्ववानृक्षराजश्च सुग्रीवसचिवाः स्थिताः ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्व एते महात्मानो वुद्धिमन्तो महावलाः |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अलं तव विनाशाय़ रामवीर्यव्यपाश्रय़ात् ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्यास्तदाक्षिप्य वचो हितमुक्तं कपीश्वरः |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पर्यशङ्कत तामीर्षुः सुग्रीवगतमानसाम् ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तारां परुषमुक्त्वा स निर्जगाम गुहामुखात् |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्थितं माल्यवतोऽभ्याशे सुग्रीवं सोऽभ्यभाषत ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
असकृत्त्वं मय़ा मूढ निर्जितो जीवितप्रिय़ः |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मुक्तो ज्ञातिरिति ज्ञात्वा का त्वरा मरणे पुनः ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्तः प्राह सुग्रीवो भ्रातरं हेतुमद्वचः |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राप्तकालममित्रघ्नो रामं सम्वोधय़न्निव ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हृतदारस्य मे राजन्हृतराज्यस्य च त्वय़ा |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
किं नु जीवितसामर्थ्यमिति विद्धि समागतम् ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवमुक्त्वा वहुविधं ततस्तौ संनिपेततुः |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
समरे वालिसुग्रीवौ शालतालशिलाय़ुधौ ||
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उभौ जघ्नतुरन्योन्यमुभौ भूमौ निपेततुः |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उभौ ववल्गतुश्चित्रं मुष्टिभिश्च निजघ्नतुः ||
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उभौ रुधिरसंसिक्तौ नखदन्तपरिक्षतौ |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शुशुभाते तदा वीरौ पुष्पिताविव किंशुकौ ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न विशेषस्तय़ोर्युद्धे तदा कश्चन दृश्यते |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवस्य तदा मालां हनूमान्कण्ठ आसजत् ||
३३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स मालय़ा तदा वीरः शुशुभे कण्ठसक्तय़ा |
३४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रीमानिव महाशैलो मलय़ो मेघमालय़ा ||
३४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कृतचिह्नं तु सुग्रीवं रामो दृष्ट्वा महाधनुः |
३५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विचकर्ष धनुःश्रेष्ठं वालिमुद्दिश्य लक्ष्यवत् ||
३५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विस्फारस्तस्य धनुषो यन्त्रस्येव तदा वभौ |
३६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वितत्रास तदा वाली शरेणाभिहतो हृदि ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स भिन्नमर्माभिहतो वक्त्राच्छोणितमुद्वमन् |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददर्शावस्थितं राममारात्सौमित्रिणा सह ||
३७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गर्हय़ित्वा स काकुत्स्थं पपात भुवि मूर्छितः |
३८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तारा ददर्श तं भूमौ तारापतिमिव च्युतम् ||
३८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हते वालिनि सुग्रीवः किष्किन्धां प्रत्यपद्यत |
३९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तां च तारापतिमुखीं तारां निपतितेश्वराम् ||
३९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामस्तु चतुरो मासान्पृष्ठे माल्यवतः शुभे |
४० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निवासमकरोद्धीमान्सुग्रीवेणाभ्युपस्थितः ||
४० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणोऽपि पुरीं गत्वा लङ्कां कामवलात्कृतः |
४१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीतां निवेशय़ामास भवने नन्दनोपमे |
४१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अशोकवनिकाभ्याशे तापसाश्रमसंनिभे ||
४१ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
भर्तृस्मरणतन्वङ्गी तापसीवेषधारिणी |
४२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उपवासतपःशीला तत्र सा पृथुलेक्षणा |
४२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उवास दुःखवसतीः फलमूलकृताशना ||
४२ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
दिदेश राक्षसीस्तत्र रक्षणे राक्षसाधिपः |
४३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रासासिशूलपरशुमुद्गरालातधारिणीः ||
४३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्व्यक्षीं त्र्यक्षीं ललाटाक्षीं दीर्घजिह्वामजिह्विकाम् |
४४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्रिस्तनीमेकपादां च त्रिजटामेकलोचनाम् ||
४४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एताश्चान्याश्च दीप्ताक्ष्यः करभोत्कटमूर्धजाः |
४५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
परिवार्यासते सीतां दिवारात्रमतन्द्रिताः ||
४५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तास्तु तामाय़तापाङ्गीं पिशाच्यो दारुणस्वनाः |
४६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तर्जय़न्ति सदा रौद्राः परुषव्यञ्जनाक्षराः ||
४६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
खादाम पाटय़ामैनां तिलशः प्रविभज्य ताम् |
४७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
येय़ं भर्तारमस्माकमवमन्येह जीवति ||
४७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्येवं परिभर्त्सन्तीस्त्रास्यमाना पुनः पुनः |
४८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भर्तृशोकसमाविष्टा निःश्वस्येदमुवाच ताः ||
४८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आर्याः खादत मां शीघ्रं न मे लोभोऽस्ति जीविते |
४९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विना तं पुण्डरीकाक्षं नीलकुञ्चितमूर्धजम् ||
४९ ख