chevron_left आदि पर्व अध्याय ९२
स्त्र्यु उवाच:
अष्टेमे वसवो देवा महाभागा महौजसः |
५० क
स्त्र्यु उवाच:
वसिष्ठशापदोषेण मानुषत्वमुपागताः ||
५० ख
स्त्र्यु उवाच:
तेषां जनय़िता नान्यस्त्वदृते भुवि विद्यते |
५१ क
स्त्र्यु उवाच:
मद्विधा मानुषी धात्री न चैवास्तीह काचन ||
५१ ख
स्त्र्यु उवाच:
तस्मात्तज्जननीहेतोर्मानुषत्वमुपागता |
५२ क
स्त्र्यु उवाच:
जनय़ित्वा वसूनष्टौ जिता लोकास्त्वय़ाक्षय़ाः ||
५२ ख
स्त्र्यु उवाच:
देवानां समय़स्त्वेष वसूनां संश्रुतो मय़ा |
५३ क
स्त्र्यु उवाच:
जातं जातं मोक्षय़िष्ये जन्मतो मानुषादिति ||
५३ ख
स्त्र्यु उवाच:
तत्ते शापाद्विनिर्मुक्ता आपवस्य महात्मनः |
५४ क
स्त्र्यु उवाच:
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि पुत्रं पाहि महाव्रतम् ||
५४ ख
स्त्र्यु उवाच:
एष पर्याय़वासो मे वसूनां संनिधौ कृतः |
५५ क
स्त्र्यु उवाच:
मत्प्रसूतं विजानीहि गङ्गादत्तमिमं सुतम् ||
५५ ख