युधिष्ठिर उवाच:
कथं धर्मे स्थातुमिच्छन्राजा वर्तेत धार्मिकः |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
पृच्छामि त्वा कुरुश्रेष्ठ तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
२ क
भीष्म उवाच:
गीतं दृष्टार्थतत्त्वेन वामदेवेन धीमता ||
२ ख
भीष्म उवाच:
राजा वसुमना नाम कौसल्यो वलवाञ्शुचिः |
३ क
भीष्म उवाच:
महर्षिं परिपप्रच्छ वामदेवं यशस्विनम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
धर्मार्थसहितं वाक्यं भगवन्ननुशाधि माम् |
४ क
भीष्म उवाच:
येन वृत्तेन वै तिष्ठन्न च्यवेय़ं स्वधर्मतः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
तमव्रवीद्वामदेवस्तपस्वी जपतां वरः |
५ क
भीष्म उवाच:
हेमवर्णमुपासीनं यय़ातिमिव नाहुषम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
धर्ममेवानुवर्तस्व न धर्माद्विद्यते परम् |
६ क
भीष्म उवाच:
धर्मे स्थिता हि राजानो जय़न्ति पृथिवीमिमाम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
अर्थसिद्धेः परं धर्मं मन्यते यो महीपतिः |
७ क
भीष्म उवाच:
ऋतां च कुरुते वुद्धिं स धर्मेण विरोचते ||
७ ख
भीष्म उवाच:
अधर्मदर्शी यो राजा वलादेव प्रवर्तते |
८ क
भीष्म उवाच:
क्षिप्रमेवापय़ातोऽस्मादुभौ प्रथममध्यमौ ||
८ ख
भीष्म उवाच:
असत्पापिष्ठसचिवो वध्यो लोकस्य धर्महा |
९ क
भीष्म उवाच:
सहैव परिवारेण क्षिप्रमेवावसीदति ||
९ ख
भीष्म उवाच:
अर्थानामननुष्ठाता कामचारी विकत्थनः |
१० क
भीष्म उवाच:
अपि सर्वां महीं लव्ध्वा क्षिप्रमेव विनश्यति ||
१० ख
भीष्म उवाच:
अथाददानः कल्याणमनसूय़ुर्जितेन्द्रिय़ः |
११ क
भीष्म उवाच:
वर्धते मतिमान्राजा स्रोतोभिरिव सागरः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
न पूर्णोऽस्मीति मन्येत धर्मतः कामतोऽर्थतः |
१२ क
भीष्म उवाच:
वुद्धितो मित्रतश्चापि सततं वसुधाधिपः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
एतेष्वेव हि सर्वेषु लोकय़ात्रा प्रतिष्ठिता |
१३ क
भीष्म उवाच:
एतानि शृण्वँल्लभते यशः कीर्तिं श्रिय़ः प्रजाः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
एवं यो धर्मसंरम्भी धर्मार्थपरिचिन्तकः |
१४ क
भीष्म उवाच:
अर्थान्समीक्ष्यारभते स ध्रुवं महदश्नुते ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
अदाता ह्यनतिस्नेहो दण्डेनावर्तय़न्प्रजाः |
१५ क
भीष्म उवाच:
साहसप्रकृती राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
अथ पापं कृतं वुद्ध्या न च पश्यत्यवुद्धिमान् |
१६ क
भीष्म उवाच:
अकीर्त्यापि समाय़ुक्तो मृतो नरकमश्नुते ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अथ मानय़ितुर्दातुः शुक्लस्य रसवेदिनः |
१७ क
भीष्म उवाच:
व्यसनं स्वमिवोत्पन्नं विजिघांसन्ति मानवाः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
यस्य नास्ति गुरुर्धर्मे न चान्याननुपृच्छति |
१८ क
भीष्म उवाच:
सुखतन्त्रोऽर्थलाभेषु न चिरं महदश्नुते ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वय़मर्थान्ववेक्षिता |
१९ क
भीष्म उवाच:
धर्मप्रधानो लोकेषु सुचिरं महदश्नुते ||
१९ ख