chevron_left आदि पर्व अध्याय ९८
भीष्म उवाच:
जामदग्न्येन रामेण पितुर्वधममृष्यता |
१ क
भीष्म उवाच:
क्रुद्धेन च महाभागे हैहय़ाधिपतिर्हतः |
१ ख
भीष्म उवाच:
शतानि दश वाहूनां निकृत्तान्यर्जुनस्य वै ||
१ ग
भीष्म उवाच:
पुनश्च धनुरादाय़ महास्त्राणि प्रमुञ्चता |
२ क
भीष्म उवाच:
निर्दग्धं क्षत्रमसकृद्रथेन जय़ता महीम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
एवमुच्चावचैरस्त्रैर्भार्गवेण महात्मना |
३ क
भीष्म उवाच:
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिय़ा पुरा ||
३ ख
भीष्म उवाच:
ततः सम्भूय़ सर्वाभिः क्षत्रिय़ाभिः समन्ततः |
४ क
भीष्म उवाच:
उत्पादितान्यपत्यानि व्राह्मणैर्निय़तात्मभिः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
पाणिग्राहस्य तनय़ इति वेदेषु निश्चितम् |
५ क
भीष्म उवाच:
धर्मं मनसि संस्थाप्य व्राह्मणांस्ताः समभ्ययुः |
५ ख
भीष्म उवाच:
लोकेऽप्याचरितो दृष्टः क्षत्रिय़ाणां पुनर्भवः ||
५ ग
भीष्म उवाच:
अथोतथ्य इति ख्यात आसीद्धीमानृषिः पुरा |
६ क
भीष्म उवाच:
ममता नाम तस्यासीद्भार्या परमसंमता ||
६ ख
भीष्म उवाच:
उतथ्यस्य यवीय़ांस्तु पुरोधास्त्रिदिवौकसाम् |
७ क
भीष्म उवाच:
वृहस्पतिर्वृहत्तेजा ममतां सोऽन्वपद्यत ||
७ ख
भीष्म उवाच:
उवाच ममता तं तु देवरं वदतां वरम् |
८ क
भीष्म उवाच:
अन्तर्वत्नी अहं भ्रात्रा ज्येष्ठेनारम्यतामिति ||
८ ख
भीष्म उवाच:
अय़ं च मे महाभाग कुक्षावेव वृहस्पते |
९ क
भीष्म उवाच:
औतथ्यो वेदमत्रैव षडङ्गं प्रत्यधीय़त ||
९ ख
भीष्म उवाच:
अमोघरेतास्त्वं चापि नूनं भवितुमर्हसि |
१० क
भीष्म उवाच:
तस्मादेवङ्गतेऽद्य त्वमुपारमितुमर्हसि ||
१० ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तस्तय़ा सम्यग्वृहत्तेजा वृहस्पतिः |
११ क
भीष्म उवाच:
कामात्मानं तदात्मानं न शशाक निय़च्छितुम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
सम्वभूव ततः कामी तय़ा सार्धमकामय़ा |
१२ क
भीष्म उवाच:
उत्सृजन्तं तु तं रेतः स गर्भस्थोऽभ्यभाषत ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
भोस्तात कन्यस वदे द्वय़ोर्नास्त्यत्र सम्भवः |
१३ क
भीष्म उवाच:
अमोघशुक्रश्च भवान्पूर्वं चाहमिहागतः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
शशाप तं ततः क्रुद्ध एवमुक्तो वृहस्पतिः |
१४ क
भीष्म उवाच:
उतथ्यपुत्रं गर्भस्थं निर्भर्त्स्य भगवानृषिः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
यस्मात्त्वमीदृशे काले सर्वभूतेप्सिते सति |
१५ क
भीष्म उवाच:
एवमात्थ वचस्तस्मात्तमो दीर्घं प्रवेक्ष्यसि ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
स वै दीर्घतमा नाम शापादृषिरजाय़त |
१६ क
भीष्म उवाच:
वृहस्पतेर्वृहत्कीर्तेर्वृहस्पतिरिवौजसा ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
स पुत्राञ्जनय़ामास गौतमादीन्महाय़शाः |
१७ क
भीष्म उवाच:
ऋषेरुतथ्यस्य तदा सन्तानकुलवृद्धय़े ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
लोभमोहाभिभूतास्ते पुत्रास्तं गौतमादय़ः |
१८ क
भीष्म उवाच:
काष्ठे समुद्गे प्रक्षिप्य गङ्गाय़ां समवासृजन् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
न स्यादन्धश्च वृद्धश्च भर्तव्योऽय़मिति स्म ते |
१९ क
भीष्म उवाच:
चिन्तय़ित्वा ततः क्रूराः प्रतिजग्मुरथो गृहान् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
सोऽनुस्रोतस्तदा राजन्प्लवमान ऋषिस्ततः |
२० क
भीष्म उवाच:
जगाम सुवहून्देशानन्धस्तेनोडुपेन ह ||
२० ख
भीष्म उवाच:
तं तु राजा वलिर्नाम सर्वधर्मविशारदः |
२१ क
भीष्म उवाच:
अपश्यन्मज्जनगतः स्रोतसाभ्याशमागतम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
जग्राह चैनं धर्मात्मा वलिः सत्यपराक्रमः |
२२ क
भीष्म उवाच:
ज्ञात्वा चैनं स वव्रेऽथ पुत्रार्थं मनुजर्षभ ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
सन्तानार्थं महाभाग भार्यासु मम मानद |
२३ क
भीष्म उवाच:
पुत्रान्धर्मार्थकुशलानुत्पादय़ितुमर्हसि ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तः स तेजस्वी तं तथेत्युक्तवानृषिः |
२४ क
भीष्म उवाच:
तस्मै स राजा स्वां भार्यां सुदेष्णां प्राहिणोत्तदा ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
अन्धं वृद्धं च तं मत्वा न सा देवी जगाम ह |
२५ क
भीष्म उवाच:
स्वां तु धात्रेय़िकां तस्मै वृद्धाय़ प्राहिणोत्तदा ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
तस्यां काक्षीवदादीन्स शूद्रय़ोनावृषिर्वशी |
२६ क
भीष्म उवाच:
जनय़ामास धर्मात्मा पुत्रानेकादशैव तु ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
काक्षीवदादीन्पुत्रांस्तान्दृष्ट्वा सर्वानधीय़तः |
२७ क
भीष्म उवाच:
उवाच तमृषिं राजा ममैत इति वीर्यवान् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
नेत्युवाच महर्षिस्तं ममैवैत इति व्रुवन् |
२८ क
भीष्म उवाच:
शूद्रय़ोनौ मय़ा हीमे जाताः काक्षीवदादय़ः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
अन्धं वृद्धं च मां मत्वा सुदेष्णा महिषी तव |
२९ क
भीष्म उवाच:
अवमन्य ददौ मूढा शूद्रां धात्रेय़िकां हि मे ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
ततः प्रसादय़ामास पुनस्तमृषिसत्तमम् |
३० क
भीष्म उवाच:
वलिः सुदेष्णां भार्यां च तस्मै तां प्राहिणोत्पुनः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
तां स दीर्घतमाङ्गेषु स्पृष्ट्वा देवीमथाव्रवीत् |
३१ क
भीष्म उवाच:
भविष्यति कुमारस्ते तेजस्वी सत्यवागिति ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
तत्राङ्गो नाम राजर्षिः सुदेष्णाय़ामजाय़त |
३२ क
भीष्म उवाच:
एवमन्ये महेष्वासा व्राह्मणैः क्षत्रिय़ा भुवि ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
जाताः परमधर्मज्ञा वीर्यवन्तो महावलाः |
३३ क
भीष्म उवाच:
एतच्छ्रुत्वा त्वमप्यत्र मातः कुरु यथेप्सितम् ||
३३ ख