chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय ९८
युधिष्ठिर उवाच:
एवं तदा प्रय़ाचन्तं भास्करं मुनिसत्तमः |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
जमदग्निर्महातेजाः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ||
१ ख
भीष्म उवाच:
तथा प्रय़ाचमानस्य मुनिरग्निसमप्रभः |
२ क
भीष्म उवाच:
जमदग्निः शमं नैव जगाम कुरुनन्दन ||
२ ख
भीष्म उवाच:
ततः सूर्यो मधुरय़ा वाचा तमिदमव्रवीत् |
३ क
भीष्म उवाच:
कृताञ्जलिर्विप्ररूपी प्रणम्येदं विशां पते ||
३ ख
भीष्म उवाच:
चलं निमित्तं विप्रर्षे सदा सूर्यस्य गच्छतः |
४ क
भीष्म उवाच:
कथं चलं वेत्स्यसि त्वं सदा यान्तं दिवाकरम् ||
४ ख
जमदग्निरु उवाच:
स्थिरं वापि चलं वापि जाने त्वां ज्ञानचक्षुषा |
५ क
जमदग्निरु उवाच:
अवश्यं विनय़ाधानं कार्यमद्य मय़ा तव ||
५ ख
जमदग्निरु उवाच:
अपराह्णे निमेषार्धं तिष्ठसि त्वं दिवाकर |
६ क
जमदग्निरु उवाच:
तत्र वेत्स्यामि सूर्य त्वां न मेऽत्रास्ति विचारणा ||
६ ख
सूर्य उवाच:
असंशय़ं मां विप्रर्षे वेत्स्यसे धन्विनां वर |
७ क
सूर्य उवाच:
अपकारिणं तु मां विद्धि भगवञ्शरणागतम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ततः प्रहस्य भगवाञ्जमदग्निरुवाच तम् |
८ क
भीष्म उवाच:
न भीः सूर्य त्वय़ा कार्या प्रणिपातगतो ह्यसि ||
८ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणेष्वार्जवं यच्च स्थैर्यं च धरणीतले |
९ क
भीष्म उवाच:
सौम्यतां चैव सोमस्य गाम्भीर्यं वरुणस्य च ||
९ ख
भीष्म उवाच:
दीप्तिमग्नेः प्रभां मेरोः प्रतापं तपनस्य च |
१० क
भीष्म उवाच:
एतान्यतिक्रमेद्यो वै स हन्याच्छरणागतम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
भवेत्स गुरुतल्पी च व्रह्महा च तथा भवेत् |
११ क
भीष्म उवाच:
सुरापानं च कुर्यात्स यो हन्याच्छरणागतम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
एतस्य त्वपनीतस्य समाधिं तात चिन्तय़ |
१२ क
भीष्म उवाच:
यथा सुखगमः पन्था भवेत्त्वद्रश्मितापितः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
एतावदुक्त्वा स तदा तूष्णीमासीद्भृगूद्वहः |
१३ क
भीष्म उवाच:
अथ सूर्यो ददौ तस्मै छत्रोपानहमाशु वै ||
१३ ख
सूर्य उवाच:
महर्षे शिरसस्त्राणं छत्रं मद्रश्मिवारणम् |
१४ क
सूर्य उवाच:
प्रतिगृह्णीष्व पद्भ्यां च त्राणार्थं चर्मपादुके ||
१४ ख
सूर्य उवाच:
अद्यप्रभृति चैवैतल्लोके सम्प्रचरिष्यति |
१५ क
सूर्य उवाच:
पुण्यदानेषु सर्वेषु परमक्षय़्यमेव च ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
उपानच्छत्रमेतद्वै सूर्येणेह प्रवर्तितम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
पुण्यमेतदभिख्यातं त्रिषु लोकेषु भारत ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
तस्मात्प्रय़च्छ विप्रेभ्यश्छत्रोपानहमुत्तमम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
धर्मस्ते सुमहान्भावी न मेऽत्रास्ति विचारणा ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
छत्रं हि भरतश्रेष्ठ यः प्रदद्याद्द्विजातय़े |
१८ क
भीष्म उवाच:
शुभ्रं शतशलाकं वै स प्रेत्य सुखमेधते ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
स शक्रलोके वसति पूज्यमानो द्विजातिभिः |
१९ क
भीष्म उवाच:
अप्सरोभिश्च सततं देवैश्च भरतर्षभ ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
दह्यमानाय़ विप्राय़ यः प्रय़च्छत्युपानहौ |
२० क
भीष्म उवाच:
स्नातकाय़ महावाहो संशिताय़ द्विजातय़े ||
२० ख
भीष्म उवाच:
सोऽपि लोकानवाप्नोति दैवतैरभिपूजितान् |
२१ क
भीष्म उवाच:
गोलोके स मुदा युक्तो वसति प्रेत्य भारत ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
एतत्ते भरतश्रेष्ठ मय़ा कार्त्स्न्येन कीर्तितम् |
२२ क
भीष्म उवाच:
छत्रोपानहदानस्य फलं भरतसत्तम ||
२२ ख